हंसराज मंडलोई कोई चमक-दमक वाला राजनीतिक चेहरा नहीं हैं, बल्कि वे उस आम आदमी की आवाज़ हैं जो रोज़मर्रा की समस्याओं से जूझता है। उनकी राजनीति सत्ता की कुर्सी से नहीं, सड़क से शुरू होती है—वहीं से, जहाँ सवाल उठते हैं और जवाब मांगने पड़ते हैं। हंसराज ने हमेशा आम लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता दी है—पानी, बिजली, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान। इन्हीं सवालों के साथ वे लगातार सत्ता से टकराते रहे हैं।
उनकी राह आसान नहीं रही। कई बार जेल जाना पड़ा, कई बार सत्ता पक्ष के लोगों ने उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की। अपमान, मारपीट और झूठे मुकदमों का सामना करते हुए भी वे झुके नहीं। हर गिरफ़्तारी के बाद उनकी आवाज़ और बुलंद हुई, हर चोट के बाद उनका इरादा और मज़बूत। हंसराज का विश्वास है कि डर से नहीं, हक़ से बदलाव आता है—और यही विश्वास उनकी जुझारू प्रवृत्ति की असली ताक़त है।
आज संवर विधानसभा क्षेत्र भाजपा के पास है, लेकिन इस राजनीतिक परिदृश्य में हंसराज मंडलोई एक मज़बूत जनस्वर बनकर उभरे हैं। वे विपक्ष की भूमिका को केवल आलोचना तक सीमित नहीं रखते, बल्कि जनसमस्याओं को दस्तावेज़ों, धरनों और संवाद के ज़रिए व्यवस्था के सामने रखते हैं। उनकी राजनीति सवाल पूछने की हिम्मत देती है—चाहे जवाब कितना भी असहज क्यों न हो।
हंसराज की खासियत यह है कि वे मैदान नहीं छोड़ते। वे जानते हैं कि सत्ता बदलती रहती है, लेकिन जनता की पीड़ा स्थायी होती है। इसलिए उनका संघर्ष चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रहता। वे गांव-गांव, मोहल्ला-मोहल्ला जाकर लोगों की बात सुनते हैं, और उसी भाषा में सत्ता से जवाब मांगते हैं। उनके लिए राजनीति करियर नहीं, जिम्मेदारी है।
आज जब राजनीति में अवसरवाद हावी है, हंसराज मंडलोई का संघर्ष एक उदाहरण है—कि ईमानदारी, धैर्य और निरंतरता से जनविश्वास जीता जा सकता है। उनकी जुझारू प्रवृत्ति बताती है कि सत्ता के खिलाफ खड़े होने के लिए संख्या नहीं, साहस चाहिए। और यही साहस उन्हें संवर में एक बुलंद आवाज़ बनाता है—ऐसी आवाज़, जो दबती नहीं, टूटती नहीं, और हर बार और मज़बूत होकर लौटती है।
