1992 का वो समय… और रघुनाथ काका की ब्रेड

सुबह की चाय या तो सूखी रोटी के साथ होती थी, या फिर पराठा–पूरी के संग। गाँव में हर चीज़ आसानी से नहीं मिलती थी।
और तभी, भोपु के बीच एक आवाज़ गूँजती—
“ब्रेड ले लो…”

बस, इतना सुनते ही दिल धड़क उठता।
नंगे पाँव दौड़ पड़ते थे हम सब… रघुनाथ काका की ब्रेड लेने।

रघुनाथ काका…
हर मौसम में, हर हाल में, रोज़ सुबह वही आवाज़।
शुरुआत में सिर पर टोकरी होती थी, फिर साइकिल आ गई।
कीचड़ हो, बारिश हो या ठंड की ठिठुरन, काका कभी नहीं रुके।
कई बार तो ऐसा लगता था, अगर उनकी आवाज़ नहीं सुनाई दी, तो सुबह अधूरी रह जाएगी।

एक दिन की तस्वीर आज भी आँखों में जमी है…

घर की तरफ आने वाली सड़क घुटनों तक कीचड़ से भरी थी।
काका की साइकिल फँस गई। काका खुद भी फँस गए।

सबसे पहले उन्होंने ब्रेड (पॉपुलर) का झोला उतारा, उसे एक साफ़ जगह रखा…
फिर पूरी ताक़त लगाकर साइकिल बाहर निकाली।

तब तक काका कीचड़ से सने खड़े थे।

मैं दौड़ा…
झोले से ब्रेड निकाली…
पैसे उसी झोले में डाल दिए।

काका मुस्कुराए।
कुछ बोले नहीं।
साइकिल संभाली… और आगे बढ़ गए।

उनकी मुस्कान में थकान थी,
लेकिन हार नहीं।

थोड़ा पीछे जाएँ तो काका कभी बकरियाँ पालते थे,
गाय-भैंस रखते थे,
दूध बेचकर घर चलाते थे।
पता नहीं कब सब छूट गया…
और ब्रेड बेचने का सफर शुरू हो गया।

जब पूरा गाँव सो रहा होता,
काका सड़क पर ब्रेड की कैरेट का इंतज़ार कर रहे होते।
कैरेट आई,
ब्रेड झोले में गई,
झोला साइकिल पर रखा…
और काका निकल पड़े।

यही उनका जीवन था।

जब से होश संभाला है,
काका का शरीर और उनका संघर्ष—
दोनों एक जैसे ही देखे हैं।

आज भी वही चेहरा,
वही मुस्कान,
वही ठहाके।

बस फर्क इतना है—
आज संघर्ष थोड़ा कम है।

लोग बनते-बनते टूट जाते हैं…
एक बार गिर जाएँ तो उठने में उम्र लग जाती है।

काका न जाने कितने कामों से गुज़रे,
सफल हुए या नहीं—यह अलग बात है,
लेकिन उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ।

आज रघुनाथ काका
“पाल टी स्टॉल” के मालिक हैं।

अगर कभी आप इंदौर–देवास रोड से गुज़रें,
लसुड़िया परमार (टायरवाला) में किसी से भी पूछ लेना—
“रघुनाथ की चाय कहाँ मिलेगी?”

ज़रूर मिलिए…
चाय पीजिए…
और सुनिए संघर्ष की कहानी,
हौसले की दास्तान।

और हाँ…
यह ज़रूर पूछिएगा—
चाय की गुमटी के बाद अब क्या करने का मन है?

पता:
गाँव—लसूडिया परमार (टायरवाला)
पेट्रोल पंप के पास

तस्वीर: मेरे द्वारा, 2019 में ली गई

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