गाँव की झिझक से मुंबई की बेबाकी तक…
सरकारी स्कूल से पढ़ा हूँ। 9वीं कक्षा से लड़कियाँ भी साथ पढ़ने लगी थीं (Co-ed)। वैसे लड़कियाँ कम ही थीं, गाँव का माहौल सख्त था, न वो बात करतीं, न हम। शुरुआत की पाँच लाइनों में लड़के, आख़िरी की दो लाइनों में लड़कियाँ बैठा करती थीं, वो भी लड़कों से दस हाथ दूर। न बात,…
