ब्रेकिंग न्यूज़

डिजिटल दुनिया में उलझे गांव, असल रिश्ते हो रहे कमजोर

आज गांवों की गलियों में जो बदलाव सबसे तेज़ी से दिख रहा है, उसकी वजह मोबाइल फोन है। कभी गांवों की पहचान आपसी मेल-जोल, भरोसे और रिश्तों की मज़बूती से होती थी, आज वही रिश्ते शक, तुलना और दिखावे की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। मोबाइल की यह “विजय” गांवों के युवाओं से लेकर शादीशुदा…

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किसानों की किस्मत का सवाल

मोहन सिंह का हाथ मिट्टी में था, पर नजरें सरकारी कार्यालय के उस कागज पर टिकी थीं जिस पर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य छपा था। धान की बालियाँ भारी थीं, पर उनकी कीमत हल्की थी। साल भर की मेहनत, पसीना और उम्मीदें… सब एक आंकड़े में सिमटकर रह गई थीं। सवेरे चार बजे उठना,…

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हंसराज मंडलोई: संघर्ष की बुलंद आवाज़

हंसराज मंडलोई कोई चमक-दमक वाला राजनीतिक चेहरा नहीं हैं, बल्कि वे उस आम आदमी की आवाज़ हैं जो रोज़मर्रा की समस्याओं से जूझता है। उनकी राजनीति सत्ता की कुर्सी से नहीं, सड़क से शुरू होती है—वहीं से, जहाँ सवाल उठते हैं और जवाब मांगने पड़ते हैं। हंसराज ने हमेशा आम लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता…

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वायरल से गुमनामी तक: ‘दिल ना दिया’ गाकर मशहूर हुआ पिंटू, अब इलाज की आस में

सोशल मीडिया पर रातों-रात चमकने वाले चेहरों की दुनिया उतनी ही बेरहम भी है। जो नाम कल तक हर स्क्रीन पर छाया रहता है, वही आज भीड़ के शोर में खो जाता है। ऐसा ही एक नाम है पिंटू—वह लड़का, जिसने “कृष का गाना सुनेगा… दिल ना दिया, दिल ना दिया ले बेटा” गाकर इंटरनेट…

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बरलाई सहकारी शक्कर कारखाने की जमीन निजी हाथों में देने से किसान नाराज़ दी आंदोलन की चेतावनी

मध्यप्रदेश के सांवेर तहसील की बरलाई शुगर मिल वर्ष 1974-75 में आसपास के गांवों के किसानों ने अपनी मेहनत की कमाई से 1000 रुपये देकर शेयर लिया था और इस सहकारी शक्कर कारखाने की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस दौर में किसानों को भरोसा दिलाया गया था कि यह मिल उनके भविष्य को…

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राहुल पटेल: मेहनत, स्वाभिमान और सवाल पूछने की हिम्मत

मध्य प्रदेश के इंदौर से लगे गांव डकाच्या के राहुल पटेल कोई बड़ा नेता नहीं है, न ही किसी बड़े मंच का चेहरा। वह एक आम युवक है, जिसने एमबीए की पढ़ाई की, लेकिन नौकरी के पीछे भागने की बजाय ईमानदारी से मेहनत का रास्ता चुना। आज वह पोहे की एक छोटी-सी दुकान लगाकर अपने…

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जब साँस लेना भी लग्ज़री बन जाए

दस साल पहले की बात है। हर सुबह सूरज निकलने से पहले मैं अपने जूते बाँधती थी और खुद को कार्टर रोड की तरफ जाते हुए पाती थी। समुद्र की ठंडी हवा मेरे चेहरे से टकराती थी, जैसे कोई चुपचाप हौसला दे रहा हो। वही हवा थी, जिसने मुझे इस शहर से और दौड़ने से…

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6:37 की शाम — सेजल उर्फ़ बुलबुल, एक रहस्य

शाम के ठीक 6 बजकर 37 मिनट। टाटा शोरूम से 21 साल की युवती सेजल अपनी ड्यूटी खत्म कर बाहर निकलती है। घर में सभी उसे प्यार से बुलबुल कहते हैं। उस दिन सेजल ने सिर दर्द और बेचैनी की शिकायत की थी। यह सुनकर मैनेजर ने उसे घर जाने की अनुमति दे दी और…

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1992 का वो समय… और रघुनाथ काका की ब्रेड

सुबह की चाय या तो सूखी रोटी के साथ होती थी, या फिर पराठा–पूरी के संग। गाँव में हर चीज़ आसानी से नहीं मिलती थी।और तभी, भोपु के बीच एक आवाज़ गूँजती—“ब्रेड ले लो…” बस, इतना सुनते ही दिल धड़क उठता।नंगे पाँव दौड़ पड़ते थे हम सब… रघुनाथ काका की ब्रेड लेने। रघुनाथ काका…हर मौसम…

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पंचायत चुनाव: लोकतंत्र निभाएँ, रिश्ते न बिगाड़ें

गाँव की पहचान सिर्फ़ खेत-खलिहान, मिट्टी और मेहनत से नहीं होती, बल्कि आपसी रिश्तों, भाईचारे और सहयोग से होती है। लेकिन दुर्भाग्य से जब गाँव में पंचायत चुनाव आते हैं, तो यही रिश्ते सबसे ज़्यादा परीक्षा में पड़ जाते हैं। जो लोग कल तक एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे, वही चुनाव के…

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