उस दिन का दृश्य अब एक अमूल्य स्मृति बनकर रह गया है। गेट तक छोड़ने आए कटारिया सर का वह हाथ जोड़कर विदा करने का भाव, न सिर्फ उनकी सहज विनम्रता, बल्कि एक शिक्षक के रूप में उनकी असीम मानवीय गरिमा का प्रतीक था। वे सचमुच एक युग के संवाहक थे, जिन्होंने कक्षा में न केवल पाठ्यक्रम पढ़ाया, बल्कि जीवन का सलीका, शालीनता का मर्म और ज्ञान के साथ व्यवहार की सरलता भी सिखाई।
एक ऐसे दौर में जब सम्मान और संस्कार शब्द महज औपचारिकता बनते जा रहे हैं, कटारिया सर ने अपने छोटे-से हावभाव से यह दिखा दिया कि असली शिक्षक वही है जो विद्यार्थी को केवल ज्ञान ही नहीं, जीवन का आदर भी देता है। अपने विद्यार्थी को हाथ जोड़कर विदा करना, यह कोई रस्म नहीं, बल्कि सच्ची गुरुता का वह दुर्लभ रूप था, जो आज के समय में लगभग विलुप्त हो चुका है।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कार और सादगी की उस पूरी परंपरा का अंत है, जिसे उन्होंने अपने जीवन से सजीव रखा था। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सीख और उनका विनम्र आचरण हमेशा हमारे साथ रहेगा। सादर नमन, प्रणाम और अनंत श्रद्धांजलि, आप जैसे गुरु सदियों में एक बार जन्म लेते हैं।
आदरणीय सर को शत-शत नमन।
