एक्सीडेंट के बाद से रेस्ट पर हूं, एक जगह पड़े रहना सचमुच सज़ा से कम नहीं। वक़्त जैसे थम-सा गया है, कटता ही नहीं। कुछ कर भी नहीं सकता, तो बस इन्हीं फ़िल्मों और सीरियल्स को दोबारा देखने में दिल बहला लिया। कमाल है ये सिनेमा—जितनी बार देखो, उतनी ही बार नया लगता है… मानो हर बार पहली बार देख रहे हों।
वक़्त जैसे थम-सा गया है
