गाँव की पहचान सिर्फ़ खेत-खलिहान, मिट्टी और मेहनत से नहीं होती, बल्कि आपसी रिश्तों, भाईचारे और सहयोग से होती है। लेकिन दुर्भाग्य से जब गाँव में पंचायत चुनाव आते हैं, तो यही रिश्ते सबसे ज़्यादा परीक्षा में पड़ जाते हैं। जो लोग कल तक एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे, वही चुनाव के दौरान अलग-अलग खेमों में बँट जाते हैं।
पंचायत चुनाव गाँव के विकास और स्थानीय नेतृत्व के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन जब ये चुनाव व्यक्तिगत दुश्मनी, जातिगत भेदभाव और झूठे प्रचार का रूप ले लेते हैं, तो समाज को नुकसान पहुँचता है। समर्थक बनते-बनते लोग इतने भावनात्मक हो जाते हैं कि छोटी-छोटी बातों पर बोलचाल बंद हो जाती है। चाय की चौपाल, खेत की मेड़ और मंदिर-मस्जिद तक राजनीति से बँटने लगते हैं।
यह समझना ज़रूरी है कि चुनाव पाँच साल में एक बार आते हैं, लेकिन रिश्ते पूरी ज़िंदगी साथ चलते हैं। आज जिस व्यक्ति के ख़िलाफ़ हम बोल रहे हैं, वही कल किसी मुश्किल समय में हमारे काम आ सकता है। चुनाव जीतने या हारने से कोई बड़ा या छोटा नहीं हो जाता, लेकिन रिश्ते टूटने से पूरा गाँव कमज़ोर हो जाता है।
पंचायत चुनाव का मतलब सेवा और जिम्मेदारी होना चाहिए, न कि बदले और अहंकार का खेल। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मनभेद नहीं। अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देना हर नागरिक का अधिकार है, पर इसके लिए रिश्तों में ज़हर घोलना सही नहीं है।
गाँव तभी मजबूत होगा जब लोग यह समझेंगे कि लोकतंत्र का असली मूल्य आपसी सम्मान में है। चुनाव के बाद भी साथ रहना है, एक ही रास्ते पर चलना है, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना है। इसलिए ज़रूरी है कि पंचायत चुनाव आएँ और जाएँ, लेकिन गाँव के रिश्ते हमेशा अटूट रहें।
