गाँव की बेटियाँ: बदलाव की नई तस्वीर

कभी जिस गाँव में महिलाओं की दुनिया घर की चारदीवारी तक सीमित मानी जाती थी, आज उसी गाँव की महिलाएँ बदलाव की सबसे मज़बूत आवाज़ बन चुकी हैं। सुबह का सूरज निकलते ही अब सिर्फ़ चूल्हा नहीं जलता, बल्कि सपनों की लौ भी तेज़ हो जाती है। सर पर घूँघट जरूर है, लेकिन आँखों में आत्मविश्वास साफ़ दिखाई देता है।

गाँव की महिलाएँ अब स्वयं सहायता समूह बनाकर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। कोई सिलाई-कढ़ाई से आमदनी कर रही है, तो कोई डेयरी, सब्ज़ी उत्पादन या छोटे व्यापार से घर की अर्थव्यवस्था संभाल रही है। जो महिलाएँ कभी बैंक का नाम सुनकर घबरा जाती थीं, आज वही खाते खोल रही हैं, लोन ले रही हैं और समय पर उसे चुका भी रही हैं।

सबसे बड़ा बदलाव सोच में आया है। अब बेटियों की पढ़ाई को बोझ नहीं, भविष्य की ताक़त माना जा रहा है। पंचायत बैठकों में महिलाएँ खुलकर अपनी बात रख रही हैं। पानी, स्कूल, स्वास्थ्य और सड़क जैसे मुद्दों पर अब पुरुषों के साथ महिलाएँ भी बराबरी से सवाल पूछ रही हैं। कई गाँवों में महिला सरपंच और वार्ड सदस्य ईमानदारी से विकास का काम कर रही हैं।

यह सफ़र आसान नहीं रहा। ताने मिले, विरोध हुआ, कभी-कभी हँसी भी उड़ाई गई। लेकिन महिलाओं ने हार नहीं मानी। एक-दूसरे का हाथ पकड़कर वे आगे बढ़ती रहीं। आज उनकी सफलता उन तमाम रूढ़ियों को तोड़ रही है, जो वर्षों से उन्हें पीछे रखने की वजह बनी थीं।

गाँव की महिलाएँ अब सिर्फ़ घर नहीं, समाज भी सँवार रही हैं। उनका आगे बढ़ना पूरे गाँव को आगे ले जा रहा है। सच यही है, जब गाँव की महिलाएँ मजबूत होती हैं, तब गाँव ही नहीं, पूरा देश मजबूत होता है।

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