मोहन सिंह का हाथ मिट्टी में था, पर नजरें सरकारी कार्यालय के उस कागज पर टिकी थीं जिस पर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य छपा था। धान की बालियाँ भारी थीं, पर उनकी कीमत हल्की थी। साल भर की मेहनत, पसीना और उम्मीदें… सब एक आंकड़े में सिमटकर रह गई थीं।
सवेरे चार बजे उठना, घंटों खेत में काम करना, कर्ज़ चुकाने की चिंता… यह सब तब और मुश्किल हो जाता है जब फसल का दाम उसकी लागत से भी कम मिलता है। मोहन सिंह के पास गणित का कोई डिग्री नहीं थी, पर वह जानता था कि बीज, खाद, पानी और मजदूरी का हिसाब कभी नहीं मिलता।
आज बाजार में उसकी धान की कीमत तय कर रहे थे वे लोग जिन्होंने कभी धान के पौधे को हाथ से छुआ तक नहीं था। बिचौलियों की लंबी श्रृंखला, दलालों के फोन और थोक व्यापारियों के षड्यंत्र के बीच किसान की उपज उसके हाथ से निकलती जाती।
गाँव के चौपाल पर सभी किसानों का मूड उदास था। रामदीन ने कहा, “पिछले साल आलू का दाम इतना गिरा कि मैंने सारी फसल खाद के रूप में डाल दी।” सुरेश ने आंखें नीची करके बताया, “मेरे तो बैंक वाले खेत नीलाम करने की धमकी दे रहे हैं।”
मोहन सिंह ने देखा – बाजार में उसकी धान का भाव पांच रुपये प्रति किलो कम हो गया था। उसने मन में गणना लगाई – दस क्विंटल धान का नुकसान पचास हज़ार रुपये। वह रकम जो उसके बेटे की स्कूल फीस हो सकती थी, या घर की छत की मरम्मत हो सकती थी।
शाम को उसकी पत्नी गीता ने जब दाम पूछे, तो मोहन सिंह ने बस सिर हिला दिया। उसकी चुप्पी में सालों का दर्द समाया हुआ था। टीवी पर खबर चल रही थी – “देश में अनाज का रिकॉर्ड उत्पादन।” मोहन सिंह ने टीवी बंद कर दिया। उस रिकॉर्ड की कीमत उसकी बढ़ती कर्ज़ और टूटती उम्मीदों में छिपी थी।
रात को चंद्रमा की रोशनी में खेत चमक रहे थे। मोहन सिंह ने सोचा – यह मिट्टी उसे धोखा नहीं देती, बस फसल उगाती है। पर व्यवस्था उसे हर बार धोखा देती है। क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब किसान की मेहनत का सही दाम मिलेगा? जब उसकी फसल उसकी मेहनत का मूल्य पा सकेगी?
आखिरकार, जिसके हाथ में हमारा अन्न पैदा होता है, क्या उसे भी पेट भर भोजन का अधिकार नहीं?
