रोहित ने सुबह खिड़की खोली तो सांस लेने में दिक्कत हुई। बाहर का नज़ारा धुंधला था, जैसे किसी ने पूरे शहर पर मटमैला चश्मा चढ़ा दिया हो। आसमान नीला नहीं, भूरे-पीले रंग में डूबा हुआ था। दूर के इमारतों के किनारे धुंध में मिल रहे थे।
सड़क पर निकला तो गला खराब होने लगा। वाहनों का शोर और धुआं दोनों ही असहनीय थे। ट्रैफिक जाम में फंसी गाड़ियाँ लगातार हॉर्न बजा रही थीं, जैसे वे खुद भी इस प्रदूषण से तंग आ चुकी हों। रोहित ने मास्क लगाया, पर आँखों में जलन हो रही थी। अखबार वाले ने कहा, “आज एयर क्वालिटी इंडेक्स ‘खतरनाक’ स्तर पर है। बच्चों और बुजुर्गों को घर से न निकलने की सलाह।”
शहर का हर कोना प्रदूषण से ग्रस्त था। नदी, जो कभी पवित्र और निर्मल हुआ करती थी, अब काले रंग की दुर्गंध देती थी। उसमें कारखानों का रसायन और शहर का कचरा बहता था। पार्कों के पेड़ों की पत्तियाँ धूल से ढकी रहतीं, हरियाली गायब हो रही थी।
रोहित को अपने बचपन का वह शहर याद आया जब आसमान साफ़ होता था और सितारे दिखाई देते थे। रातों में तारों को गिनना उसका पसंदीदा शगल था। अब तो रात में भी धुंध छाई रहती, चाँद-तारे भी छिपने लगे थे।
प्रदूषण सिर्फ हवा और पानी तक सीमित नहीं था। शोर प्रदूषण ने शहर की शांति छीन ली थी। निरंतर बजते हॉर्न, निर्माण कार्यों का शोर, लाउडस्पीकरों की आवाज़ – मानसिक शांति के लिए भी यह शहर अब अभिशाप बन चुका था।
स्कूल में रोहित की बेटी ने पूछा, “पापा, क्या हमारे शहर में कभी साफ़ हवा आएगी?” रोहित के पास कोई जवाब नहीं था। वह जानता था कि वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन, कचरा प्रबंधन जैसे उपायों की जरूरत है, पर शहर की भागती दौड़ती जिंदगी में यह सब पीछे छूटता जा रहा था।
शाम को टीवी पर खबर आई – “शहर में सांस के रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी।” रोहित ने गहरी सांस लेने की कोशिश की, पर फेफड़ों में भारीपन महसूस हुआ। यह शहर जिसने उसे रोजगार और सुविधाएं दी थीं, अब धीरे-धीरे उसकी सेहत छीन रहा था। सवाल यह था कि क्या विकास की यह कीमत बहुत ज्यादा नहीं हो रही?
