शिवनारायण चौधरी, यह नाम केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि गाँव की लोक-संस्कृति की जीवित धरोहर का प्रतीक है। बीते 60 वर्षों से वे गाँव-गाँव घूमकर लोकगीत गा रहे हैं। खेतों की मेड़ों, मेलों की रौनक, शादी-ब्याह के आँगन और फसल कटाई की थकान, हर जगह उनकी आवाज़ ने लोगों के दिलों को जोड़ा है। आज 90 वर्ष की उम्र में भी, जब कई लोग बोलना तक छोड़ देते हैं, शिवनारायण जी का कंठ लोकगीतों से उतना ही सधा हुआ है जितना युवावस्था में था।
उनके गीतों में गाँव का इतिहास बसता है, मिट्टी की महक, किसान की मेहनत, माँ की लोरी, प्रेम की सादगी और जीवन का दर्शन। वे केवल गायक नहीं, बल्कि कथावाचक हैं; हर गीत के साथ एक कहानी, एक सीख, एक स्मृति जुड़ी होती है। उनकी आवाज़ में न बनावट है, न दिखावा, बस अनुभव की सच्चाई है। यही वजह है कि उनकी गायकी सुनते ही श्रोता ठहर जाते हैं।
समय बदला, मंच बदले, संगीत के साधन बदले, लेकिन शिवनारायण जी नहीं बदले। उन्होंने न कभी लोकगीतों से समझौता किया, न उन्हें बाजारू रंग में ढाला। वे मानते हैं कि लोकगीतों की आत्मा गाँव की ज़िंदगी में है, और वही उनकी ताक़त है। कई पीढ़ियाँ उनकी गायकी सुनकर बड़ी हुईं; बच्चों ने उनसे पहली बार लोकधुनें सीखीं, युवाओं ने अपनी जड़ों को पहचाना और बुज़ुर्गों ने अपने बीते दिन दोबारा जिए।
उनकी उम्र आज एक संदेश है, कि संस्कृति सांसों से चलती है, कैलेंडर से नहीं। हर सुर में अनुशासन, हर ताल में सादगी और हर शब्द में जीवन का सत्य—यही उनकी पहचान है। शिवनारायण चौधरी जैसे कलाकार हमें याद दिलाते हैं कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी लोक-परंपराओं को थामे रखना कितना ज़रूरी है। जब तक उनकी आवाज़ गूँजती रहेगी, गाँव की आत्मा जीवित रहेगी, और लोकगीतों की लौ जलती रहेगी।
