मध्य प्रदेश के इंदौर से लगे गांव डकाच्या के राहुल पटेल कोई बड़ा नेता नहीं है, न ही किसी बड़े मंच का चेहरा। वह एक आम युवक है, जिसने एमबीए की पढ़ाई की, लेकिन नौकरी के पीछे भागने की बजाय ईमानदारी से मेहनत का रास्ता चुना। आज वह पोहे की एक छोटी-सी दुकान लगाकर अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभा रहा है। उसकी सुबह दुकान के चूल्हे की आँच से शुरू होती है और दिन ग्राहकों की भीड़ में गुजरता है। यही उसकी पहचान है, मेहनतकश, आत्मनिर्भर और ज़मीन से जुड़ा इंसान।
समाज में बदलाव की लगन:
आज जब हर कोई आर्थिक तनाव के दौर से गुजर रहा है, ऐसे समय में राहुल अपने परिजनों और आसपास के लोगों से बार-बार कहता है कि जीवन में कर्ज़-मुक्त रहना बहुत ज़रूरी है। उसका मानना है कि कर्ज़ का बोझ हमारे भीतर की रचनात्मकता को दबा देता है। वह नई उम्र के युवाओं को शराब और नशे की ओर धकेलने वाली सोच के खिलाफ भी खुलकर बोलता है और लोगों को जागरूक करता है।
गांव में अब गोदाम और कंपनियाँ आ चुकी हैं। राहुल ने अपने आसपास के क्षेत्र के कई युवाओं को निस्वार्थ भाव से रोजगार भी दिलवाया है। उसका मानना है कि जीवन में काम से कम-से-कम इतना सक्षम होना ज़रूरी है कि रोज़मर्रा के खर्च और जीवन-यापन के लिए किसी से ब्याज पर पैसा उधार मांगने की नौबत न आए। लेकिन राहुल की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वह सोशल मीडिया पर समाज और जनता से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखता है। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकार जैसे सवाल उठाना उसे ज़रूरी लगता है। वह सवाल पूछता है, तर्क देता है और सत्ता से जवाब चाहता है, और यही बात कुछ लोगों को चुभती है।
नतीजा यह होता है कि राहुल को लगातार ताने सुनने पड़ते हैं। उसकी देशभक्ति को उसकी दुकान, उसकी आर्थिक स्थिति और उसके सवालों के तराजू पर तौला जाता है। जैसे सवाल पूछना कोई गुनाह हो और सरकार से जवाब मांगना देश के खिलाफ साज़िश। असल में राहुल जैसे लोग ही लोकतंत्र की असली ताकत हैं। वह यह याद दिलाता है कि देशभक्ति का मतलब सिर्फ नारे लगाना नहीं, बल्कि गलत के खिलाफ बोलना भी है। एमबीए करके पोहे की दुकान लगाना उसकी मजबूरी नहीं, उसका आत्मसम्मान है। और समाज के मुद्दों पर बोलना उसका अधिकार।
राहुल पटेल की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज के भारत में एक आम नागरिक को सवाल पूछने की कीमत भली बुरी बातें सुनकर चुकानी पड़ेगी? या फिर हम ऐसे लोगों को सम्मान देंगे, जो मेहनत भी करते हैं और सच बोलने का साहस भी रखते हैं। राहुल अकेला नहीं है वह उस भारत की आवाज़ है, जो डरता नहीं, झुकता नहीं और चुप नहीं रहता।
