आज गांवों की गलियों में जो बदलाव सबसे तेज़ी से दिख रहा है, उसकी वजह मोबाइल फोन है। कभी गांवों की पहचान आपसी मेल-जोल, भरोसे और रिश्तों की मज़बूती से होती थी, आज वही रिश्ते शक, तुलना और दिखावे की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। मोबाइल की यह “विजय” गांवों के युवाओं से लेकर शादीशुदा जोड़ों तक के जीवन में दरार पैदा कर रही है।
युवा लड़के-लड़कियां मोबाइल के ज़रिये एक ऐसी दुनिया में दाख़िल हो रहे हैं, जहां हर चीज़ परफेक्ट दिखती है। इंस्टाग्राम पर चमकते चेहरे, महंगे कपड़े, बनावटी मुस्कानें और नकली खुशियां, ये सब मन में असंतोष भर रहे हैं। किसी की चैट पकड़ ली गई, कहीं किसी पुरानी फोटो ने हंगामा खड़ा कर दिया, तो कहीं “लाइक” और “फॉलोअर” की गिनती रिश्तों से ज़्यादा अहम हो गई। नतीजा, शक, झगड़े और अलगाव।
शादीशुदा रिश्तों पर इसका असर और भी गहरा है। पहले पति-पत्नी के बीच बातचीत, बैठकी और साझा मेहनत रिश्तों को संभालती थी। अब मोबाइल स्क्रीन के बीच बैठा सन्नाटा है। एक-दूसरे के बजाय फोन पर ज़्यादा समय देने से भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। छोटी-छोटी बातों पर शक जन्म ले रहा है, किससे बात हो रही है, किसकी फोटो देखी जा रही है, किसे देर रात मैसेज किया गया। यही शक धीरे-धीरे भरोसे को खा जाता है।
गांवों में जहां समाज की निगरानी और सामूहिकता रिश्तों को संभालती थी, वहां अब मोबाइल ने निजी दुनिया बना दी है, बिना जिम्मेदारी के। यह कहना गलत नहीं होगा कि समस्या मोबाइल नहीं, उसका बेलगाम इस्तेमाल है। जरूरत है समझदारी की, डिजिटल सीमाएं तय करने की, संवाद को वापस लाने की और यह समझने की कि रिश्ते स्क्रीन से नहीं, समय, भरोसे और सम्मान से ज़िंदा रहते हैं। अगर समय रहते नहीं संभले, तो मोबाइल की यह जीत रिश्तों की सबसे बड़ी हार साबित होगी।
