बरलाई सहकारी शक्कर कारखाने की जमीन निजी हाथों में देने से किसान नाराज़ दी आंदोलन की चेतावनी

मध्यप्रदेश के सांवेर तहसील की बरलाई शुगर मिल वर्ष 1974-75 में आसपास के गांवों के किसानों ने अपनी मेहनत की कमाई से 1000 रुपये देकर शेयर लिया था और इस सहकारी शक्कर कारखाने की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस दौर में किसानों को भरोसा दिलाया गया था कि यह मिल उनके भविष्य को मजबूत करेगी, उन्हें गन्ने का उचित मूल्य दिलाएगी और क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी।

शुरुआती वर्षों में यह मिल क्षेत्र के किसानों के लिए वरदान साबित हुई। बड़ी संख्या में किसान यहां गन्ना सप्लाई करते थे और हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता था। लेकिन समय के साथ हालात बदलते चले गए। करीब पांच हजार से अधिक किसानों की पूंजी इस मिल में लगी हुई है, लेकिन आज, लगभग पचास साल बाद भी किसानों की वह मेहनत की कमाई अटकी हुई है। न तो कारखाना दोबारा चालू हो सका और न ही किसानों को उनका शेयर अमाउंट वापस मिला।

किसानों का कहना है कि वर्षों से वे अपने पैसों की वापसी की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। इस स्थिति के चलते किसानों में गहरी नाराजगी है। उन्हें न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, बल्कि मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ रहा है।

कुछ वर्ष पहले बरलाई क्षेत्र में टेक्सटाइल सेक्टर के लिए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की तैयारी की गई थी। मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम (MPIDC) ने बंद पड़ी बरलाई चीनी मिल और उसके आसपास की करीब 33 हेक्टेयर जमीन को टेक्सटाइल हब में बदलने का मन बना लिया है। MPIDC के अनुसार, यहां प्लग-एंड-प्ले सुविधा, औद्योगिक भूखंड, वाणिज्यिक स्थान और आवासीय क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। जल्द ही परियोजना पर काम शुरू होने की उम्मीद है और कई उद्योगों ने बरलाई में निवेश को लेकर रुचि भी दिखाई है।

इसी बीच अब यह चर्चा सामने आई है कि बरलाई शुगर मिल की जमीन सरकार कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल सेक्टर) को सौंपने की तैयारी कर रही है और यहां टेक्सटाइल हब बनाने की योजना है। जैसे ही यह जानकारी किसानों तक पहुंची, उनमें आक्रोश फैल गया। किसानों का कहना है कि यह जमीन उनकी मेहनत और पूंजी से बनी संपत्ति है, इसलिए इसके उपयोग पर कोई भी फैसला उनकी सहमति के बिना नहीं लिया जाना चाहिए।

इस आंदोलन को प्रमुखता से उठाने वाले सांवेर तहसील के किसान नेता हंसराज मंडलोई ने बताया कि किसानों की साफ मांग है कि वर्ष 1974-75 में दिए गए 1000 रुपये आज सभी पांच हजार से अधिक किसानों को ब्याज (सूद) सहित वापस किए जाएंहंसराज मंडलोई ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार की है।

बरलाई शुगर मिल आज सिर्फ एक बंद पड़ी फैक्ट्री नहीं, बल्कि हजारों किसानों की उम्मीदों और संघर्ष की प्रतीक बन चुकी है। अब देखना यह होगा कि सरकार और प्रशासन किसानों की इस जायज मांग पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या उन्हें उनका हक मिल पाएगा या नहीं।

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