पहले तो मैं थोड़ा डर गया… फिर धीरे–धीरे डर ख़त्म होने लगा।
राजू का ढाबा है, खाना खुद ही बनाता है। सेंव टमाटर कमाल की बनाता है, साथ में तवा रोटी… ओय-होय, मज़ेदार! मैं जब भी इंदौर जाता हूँ, अपने मित्र राहुल (MBA पोहेवाला) के साथ वहाँ एक–दो फेरे ज़रूर लगा लेता हूँ। राहुल को इसलिए ले जाता हूँ क्योंकि राजू की खोज राहुल ने ही की थी।
कुछ दिन पहले ज़बान लपलपाई, सेंव टमाटर की तस्वीरें आँखों के सामने दौड़ने लगीं। राहुल को फोन घुमाया तो पता चला, राजू को कैंसर ने जकड़ रखा है। सुनते ही झटका लगा… पर भूख भी लगी थी, तो कहीं और चल पड़े, लेकिन मन राजू में ही अटक गया था। अमूमन किसी भी इंसान को जब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो जाए और उसकी खबर किसी भी व्यक्ति को पता चले तो मन में सवाल उठते ही हैं, क्या होगा? कितने दिन बचे हैं? बच पाएगा या नहीं? ऐसे तमाम सवाल मुझे भी परेशान करने लगे।

वक़्त बीता, एक दिन राहुल ने बताया, “राजू का ढाबा फिर से शुरू हो गया है। चलें क्या?” बस तुरंत निकल पड़े। पहुँचते ही सेंव टमाटर और तवा रोटी का ऑर्डर दे दिया। हम थोड़े लेट पहुँचे थे। राजू जाने ही वाला था, पर हमारे कहने पर रुक गया। खाना खाने के बाद मैंने बिना हिचकिचाए पूछ लिया, “राजू भाई… कैसी चल रही है कैंसर से लड़ाई?”
राजू ठक से बोला, “लगभग पछाड़ दिया है… थोड़ी कसर बची है, वो भी आने वाले समय में पूरी हो जाएगी।”
फिर उसने पूरी कहानी सुनाई, “मुँह में एक छाला हुआ था। पहले तो लगा साधारण है। पर बढ़ता गया तो लोकल में ट्रीटमेंट करवाता रहा। 2–3 महीने बीत गए, ठीक नहीं हुआ। फिर एक आयुर्वेद वाले के पास गया, 4 महीने और निकल गए। तब जाकर कैंसर के डॉक्टर को दिखाया… और पता चला कि कैंसर है।”
“पहले कई दिन तक थोड़ा सहमा रहा… लेकिन फिर सोचा,जितने दिनों की साँसें लिखी हैं, उतने दिन तो चलनी ही हैं। फिर कैंसर से क्या डरना? और वैसे भी मैं तो माँ चामुंडा का भक्त हूँ, वो सब संभाल लेगी। इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी। बीमारी का पता चलने के ठीक 6 महीने बाद खुद ही ढाबे की सफाई की और फिर रसोई में लग गया। ढाबा दोबारा शुरू किया। अब तो ऐसा लगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। और वैसे भी मैं ज़्यादा नहीं सोचता, जो होगा, देखा जाएगा।”
राजू का कमाल का जज़्बा है, जानलेवा बीमारी को तिनके की तरह उड़ा दिया।
आज राजू स्वस्थ है, ऊर्जा से भरा हुआ है। कैंसर को वह ऐसे लेता है जैसे आम सर्दी–ज़ुकाम हो, ज़रा भी भय नहीं। राजू जैसे लोग उदाहरण हैं, अगर विल पावर है, तो कोई बीमारी आपके हौसले से बड़ी नहीं होती। उसे हारना ही पड़ता है।
राजू हेल्दी रहे, लंबी उम्र पाए… और सेंव टमाटर बनाता रहे।
आप लोग भी कभी देवास–इंदौर हाईवे से गुज़रें तो
“राजू का ढाबा, माँ चामुंडा नाश्ता पॉइंट” (नियर डकाच्या) ज़रूर ढूँढें।
सेंव टमाटर ज़रूर खाएँ।
राजू ने एक अहम बात और बताई, मांगलिया से शिप्रा के बीच दो बड़े ढाबे, गुरुकृपा और अमिताभ बच्चन वाला ढाबा, इन दोनों की नींव राजू ने ही रखी थी।
राजू के हाथों का बना खाना ही इन ढाबों की पहचान बना। आज भी लोग उसे याद करते हैं।
फोटो: मेरे कैमरे से
जगह: जेआरजी वेयर हाउस के पास AB रोड़ डकाच्या
