रामू की उम्र सिर्फ उन्नीस साल थी, लेकिन उसकी आँखों में जवानी की चमक नहीं, एक धुंधली सूनापन था। गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे, जहाँ कभी बच्चे खेलते थे और बुजुर्ग गप्पें मारते थे, अब नशे के अड्डे बन गए थे। शाम ढलते ही वहाँ इकट्ठा होने वाली नौजवान टोली की बातों में अब खेती-बाड़ी या सपनों की चर्चा नहीं होती थी। बस शहर से कौन सा नया सामान आया है, किसने कितनी पी है – इसी की चर्चा होती।
रामू का पिता सोमनाथ दिन भर खेत में पसीना बहाता, ताकि उसका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने। लेकिन रामू की दिलचस्पी किताबों में नहीं, उस छोटी सी शीशी में थी जो उसे क्षणिक खुशी देती और फिर लंबे अरसे तक उदासी में धकेल देती। पहले तो उसने दोस्तों के दबाव में “बस एक बार” की थी। फिर वह “बार” रोज का साथी बन गया।
गाँव की इस नई तस्वीर में सिर्फ रामू अकेला नहीं था। उसके दोस्त मोहन, सुरेश, विजय… सबकी एक जैसी कहानी थी। युवाओं के हाथों में अब हल और किताबें नहीं, सिगरेट और शीशियाँ थीं। शारीरिक श्रम से दूरी और आसान राहत के चक्कर ने उन्हें नशे के गर्त में धकेल दिया था।
गाँव की औरतें चिंता से भरी थीं। रामू की माँ गीता रोज मंदिर जाती, भगवान से अपने बेटे की सुध माँगती। पंचायत के बैठकों में यह मुद्दा उठता, पर कोई ठोस हल नहीं निकलता। शहर से आने वाला नशा सस्ता और आसानी से उपलब्ध था। नौजवानों की ऊर्जा, जो गाँव के विकास में लगनी चाहिए थी, वह नशे के धुएँ में उड़ रही थी।
एक दिन रामू की बहन राधा ने उसे आइने के सामने खड़ा कर दिया। “भैया, खुद को देखो। क्या तुम यही बनना चाहते थे?” आइने में रामू ने अपना पतला चेहरा, धंसी आँखें और बिखरे बाल देखे। उस रात उसने सोचा – उसके पिता की तरह वह भी तो किसान बनना चाहता था। पर नशे ने उसकी इच्छाशक्ति को जकड़ लिया था।
नशा सिर्फ शरीर को नहीं, सपनों को भी बंदी बना लेता है। गाँव की जवानी को इस जकड़न से मुक्त करने के लिए सिर्फ प्रतिबंध नहीं, बल्कि रोजगार, मनोरंजन के साधन और जीवन में नई दिशा की जरूरत है। वरना गाँव के भविष्य का सूरज, नशे के बादलों के पीछे ही छुपा रह जाएगा।
