कभी यह माना जाता था कि हार्ट अटैक, डायबिटीज़ (शुगर) और हाई ब्लड प्रेशर (बीपी) जैसी बीमारियाँ केवल शहरों तक सीमित हैं, लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। अब गाँवों में भी इन बीमारियों के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। जो लोग खेतों में मेहनत करते थे और प्राकृतिक जीवन जीते थे, वही अब अचानक हार्ट अटैक, शुगर और बीपी की चपेट में आ रहे हैं।
इस बढ़ते ख़तरे की सबसे बड़ी वजह जीवनशैली में आया बदलाव है। गाँवों में भी अब पैकेट वाला खाना, अधिक तेल-मसाले वाला भोजन, मीठे पेय और तंबाकू का सेवन बढ़ गया है। पहले जहाँ लोग पैदल चलते थे, आज वहाँ बाइक और ट्रैक्टर का ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है। शारीरिक मेहनत कम हुई है और तनाव बढ़ा है। आर्थिक दबाव, कर्ज़, फसल की अनिश्चितता और पारिवारिक चिंताएँ लोगों को अंदर ही अंदर तोड़ रही हैं।
एक और बड़ी समस्या है स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही। गाँवों में आज भी लोग बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते। सीने में दर्द, चक्कर, थकान या बार-बार प्यास लगने जैसे लक्षणों को आम बात समझकर अनदेखा कर दिया जाता है। समय पर जाँच और इलाज न मिलने से स्थिति जानलेवा बन जाती है। कई मामलों में अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही जान चली जाती है।
इस संकट से निपटने के लिए ज़रूरी है कि गाँवों में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाई जाए। संतुलित भोजन, नियमित पैदल चलना, नशे से दूरी और समय-समय पर ब्लड प्रेशर व शुगर की जाँच को आदत बनाया जाए। सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करना होगा।
गाँव देश की रीढ़ हैं। अगर गाँव स्वस्थ नहीं रहेंगे, तो देश भी स्वस्थ नहीं रह पाएगा। अब समय आ गया है कि गाँवों में बढ़ती इन बीमारियों को चेतावनी मानकर गंभीर कदम उठाए जाएँ, ताकि ज़िंदगियाँ समय से पहले न छिनें।
