हर उम्र में बदलती हुई एक फ़िल्म

एक फ़िल्म, तीन हिस्से और एक ज़िंदगी

बचपन से “मेरा नाम जोकर” फ़िल्म से मेरी क़रीबी रही है. यह क़रीबी किसी एक बार देखने से नहीं बनी, बल्कि धीरे-धीरे, उम्र के साथ गहरी होती चली गई. मेरे पिता ने मेरे जन्मदिन पर मुझे इस फ़िल्म की सीडी लाकर दी थी. उस सीडी में फ़िल्म तीन हिस्सों में थी और शायद तभी पहली बार यह एहसास हुआ था कि ज़िंदगी भी किसी एक कहानी की तरह नहीं चलती, वह भी तीन हिस्सों में बंटी होती है. बचपन, जवानी और फिर अनुभवों से भरा एक ठहराव. उस उम्र में शायद यह सब साफ़-साफ़ समझ में नहीं आया था, लेकिन मेरा नाम जोकर ने भीतर कहीं यह बात बैठा दी थी.

इसके बाद यह फ़िल्म कई बार देखी गई. हर बार देखने पर लगा कि वही दृश्य हैं, वही संवाद हैं, वही गीत हैं, लेकिन देखने वाला बदल चुका है. बचपन में जोकर का रंगीन चेहरा दिखता था, तो बड़े होने पर उसके पीछे छुपा अकेलापन दिखने लगा. इस वीकेंड में भी मैंने यह फ़िल्म फिर देखी. और एक बार फिर महसूस हुआ कि यह फ़िल्म हर उम्र में अलग तरह से बात करती है, जैसे वह हर बार नए सिरे से जीवन को समझाने की कोशिश कर रही हो.

‘जीना यहां, मरना यहां’

कुछ फ़िल्में रिलीज़ के समय असफल हो जाती हैं, लेकिन वक़्त के साथ उनका अर्थ बदलता है. बॉक्स ऑफ़िस पर न चल पाने वाली वही फ़िल्में बाद में सिनेमा के इतिहास में अलग जगह बना लेती हैं. मेरा नाम जोकर ऐसी ही फ़िल्म है.

राज कपूर के सिनेमा को समझने के लिए मेरा नाम जोकर देखना लगभग ज़रूरी हो जाता है. यह उनकी सबसे महत्वाकांक्षी फ़िल्म है, एक तरह से आत्मकथात्मक भी, जिसमें उनके शुरुआती सिनेमा की मासूमियत और बाद के दौर की भावनात्मक गहराई साथ दिखाई देती है. यह फ़िल्म रोमांस भी है, हास्य भी, लेकिन सबसे ज़्यादा यह त्रासदी है.

फ़िल्म का पहला गीत “जीना यहां, मरना यहां” केवल एक गीत नहीं, बल्कि पूरी कहानी की आत्मा है. सर्कस के मंच पर जोकर राजू यह गीत दर्शकों के सामने गाता है, लेकिन असल में यह उसका जीवन-दर्शन है. शोमैन का नियम यही है कि अपनी पीड़ा को छुपाकर दूसरों को हंसाया जाए. हिंदी सिनेमा में ये शब्द इसलिए भी यादगार हैं क्योंकि वे कलाकार के पूरे अस्तित्व को परिभाषित करते हैं.

फ़िल्म का जो संस्करण आज आम तौर पर देखा जाता है, वह मूल लंबाई से काफ़ी छोटा है. इसके कारण कई संदर्भ और भावनात्मक जोड़ छूट जाते हैं. इसके बावजूद जो बचता है, वह भी गहराई से झकझोरने वाला है.

पहला अध्याय: बचपन और पहली मोहब्बत

कहानी की शुरुआत राजू के बचपन से होती है. उसका पिता एक जोकर था, जो लोगों को हंसाते-हंसाते मंच पर ही अपनी जान गंवा देता है. मां अपने बेटे को पिता की जोकर गुड़िया सौंपती है. वही गुड़िया आगे चलकर राजू के जीवन की सबसे स्थायी वस्तु बन जाती है.

राजू कहता है कि वह भी जोकर बनेगा, लेकिन मां चाहती है कि उसका जीवन कुछ और हो. यही टकराव आगे चलकर पूरी फ़िल्म का भावनात्मक आधार बनता है.

स्कूल के दिनों में राजू को अपनी शिक्षिका मैरी से प्रेम हो जाता है. यह प्रेम मासूम है, उलझन से भरा है और अपराध-बोध से भी. किशोर उम्र में उठती भावनाओं को राज कपूर ने बेहद संवेदनशील ढंग से दिखाया है. इस भूमिका में ऋषि कपूर का अभिनय चौंकाने वाला है. बिना किसी बनावट के, वह उस उम्र की असमंजस भरी भावनाओं को जीते हुए दिखाई देते हैं.

मैरी का किसी और से विवाह तय हो जाता है. राजू उस शादी का हिस्सा भी बनता है. विदाई के समय उसे उसकी जोकर गुड़िया वापस मिलती है. पहली मोहब्बत यहीं खत्म हो जाती है, लेकिन उसका दर्द राजू के भीतर बना रहता है.

दूसरा अध्याय: स्मृति और बिछड़ना

युवा राजू अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए मेहनत करता है. वह सड़कों पर जोकर बनकर बच्चों को हंसाता है, लेकिन मां से यह सच छुपाता है. हालात उसे सर्कस तक ले जाते हैं, जहां उसकी मुलाक़ात रूसी कलाकार मरीना से होती है.

भाषा की दीवार के बावजूद दोनों के बीच अपनापन पनपता है. यह रिश्ता कोमल है, बिना किसी भारी त्रासदी के. लेकिन इसकी उम्र भी सीमित है. मरीना को अपने देश लौटना होता है.

मां जब सर्कस में राजू को अपने पिता की तरह ट्रैपेज़ पर करतब करते देखती है, तो सच्चाई सामने आ जाती है. उसी सदमे में उसकी मृत्यु हो जाती है. यह फ़िल्म का सबसे हृदयविदारक मोड़ है.

मां की मृत्यु के बाद भी राजू को मंच पर जाकर लोगों को हंसाना पड़ता है. वह दृश्य, जहां वह अपने निजी दुःख को हास्य में बदल देता है, भारतीय सिनेमा के सबसे मार्मिक दृश्यों में गिना जा सकता है. यही मेरा नाम जोकर का केंद्रीय विचार है. कलाकार का दर्द मंच के पीछे रह जाता है.

तीसरा अध्याय: छल, प्रेम और अकेलापन

सर्कस छोड़ने के बाद राजू भटकता है. उसकी मुलाक़ात मीना से होती है, जो लड़के के भेष में सड़कों पर जी रही है. दोनों मिलकर फुटपाथ पर छोटा-सा तमाशा शुरू करते हैं. धीरे-धीरे प्रेम जन्म लेता है.

मीना को फ़िल्मों में काम करने का मौक़ा मिलता है और वह राजू को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाती है. राजू के लिए यह एक और त्याग है, एक और अकेलापन. यहां जोकर गुड़िया फिर उसके पास लौट आती है, जैसे हर बार.

इस अध्याय में प्रेम के साथ धोखे और महत्वाकांक्षा का टकराव दिखाई देता है. राजू हर बार किसी और की खुशी के लिए खुद को पीछे रख देता है.

अंत और उसके बाद

फ़िल्म का अंत जानबूझकर अधूरा-सा लगता है. राजू मंच पर आख़िरी बार प्रदर्शन करता है. पर्दे पर “द एंड” लिखा आता है, लेकिन उसके ऊपर “पॉज़िटिवली नोट” भी. जैसे यह कहानी ख़त्म नहीं हुई हो.

मेरा नाम जोकर अपने समय में असफल रही. इसकी लंबाई, इसकी उदासी और इसकी जटिल भावनाएं शायद उस दौर के दर्शकों के लिए भारी थीं. इस असफलता ने राज कपूर को गहरा आघात पहुंचाया.

लेकिन समय के साथ फ़िल्म की क़ीमत बदली. आज इसे राज कपूर की सबसे साहसी और ईमानदार रचना माना जाता है. यह फ़िल्म याद दिलाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति भी हो सकता है.

मेरा नाम जोकर आज भी इसलिए जीवित है क्योंकि यह हंसते हुए रोने की कला सिखाती है. और शायद यही वजह है कि “जीना यहां, मरना यहां” आज भी सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि एक सोच बन चुका है.

हर बार मेरा नाम जोकर देखकर यही महसूस होता है कि ज़िंदगी में कई बार तालियां सबसे ज़्यादा उसी को मिलती हैं, जो भीतर से सबसे ज़्यादा टूटा होता है. और शायद यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी सच्चाई है. यही वजह है कि दशकों बाद भी यह फ़िल्म चुपचाप दिल के भीतर उतर जाती है और देर तक वहीं ठहरी रहती है.

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