जोशी सर: चार दशक की शिक्षा, सेवा और संस्कारों की मिसाल

ग्राम डकाच्या में पिछले 40 वर्षों से शिक्षा की अलख जगा रहे हेमंत जोशी केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक पूरे गाँव की यादों, संस्कारों और भविष्य का हिस्सा हैं। बच्चे हों या अभिभावक—सब उन्हें स्नेह और सम्मान से “जोशी सर” के नाम से जानते हैं। उनकी पहचान किसी पद या पुरस्कार से नहीं, बल्कि उन अनगिनत छात्रों की ज़िंदगी से बनी है जिन्हें उन्होंने गढ़ा, संवारा और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

जोशी सर की सबसे बड़ी खासियत उनका धैर्य है। कठिन से कठिन छात्र भी उनके सामने सहज हो जाता था। वे मानते थे कि हर बच्चा सीख सकता है—बस उसे सही समय, सही भाषा और सही समझ की ज़रूरत होती है। पढ़ाना उनके लिए नौकरी नहीं, बल्कि कर्तव्य और साधना थी। यही वजह है कि उन्होंने कभी समय की पाबंदी या सुविधाओं की कमी को बहाना नहीं बनने दिया।

वे एक संवेदनशील और मददगार शिक्षक रहे। किसी छात्र की आर्थिक परेशानी हो या पारिवारिक संकट—जोशी सर हमेशा आगे खड़े दिखे। कई बच्चों की किताबें, फीस और मार्गदर्शन उन्होंने चुपचाप संभाला। उनका मानना था कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का निर्माण भी है। इसलिए वे बच्चों को अनुशासन, ईमानदारी, सहानुभूति और समाज के प्रति जिम्मेदारी सिखाते रहे।

जोशी सर की कक्षा केवल पढ़ाई का स्थान नहीं थी—वह संवाद, भरोसे और आत्मविश्वास की जगह थी। वे सवाल पूछने के लिए प्रेरित करते, गलती करने से डर हटाते और मेहनत को आदत बनाते थे। परीक्षा से पहले का तनाव हो या भविष्य को लेकर असमंजस—उनकी एक बात बच्चों को स्थिर कर देती थी।

चार दशकों में पीढ़ियाँ बदलीं, समय बदला, पढ़ाने के तरीके बदले—लेकिन जोशी सर का मूल स्वभाव नहीं बदला। आज भी ग्राम डकाच्या में जब किसी सफल व्यक्ति का ज़िक्र होता है, तो बातचीत जोशी सर तक पहुँच ही जाती है। यह उनके योगदान की सबसे सच्ची गवाही है।

जोशी सर जैसे शिक्षक समाज की रीढ़ होते हैं। वे मंचों पर नहीं दिखते, सुर्खियाँ नहीं बनते, लेकिन उनके काम की रोशनी दशकों तक फैलती रहती है। ग्राम डकाच्या के लिए जोशी सर केवल एक शिक्षक नहीं—वे संस्कारों की विरासत हैं, जिन पर पूरा गाँव गर्व करता है।

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