ग्राम डकाच्या के सरपंच लखन पटेल का नाम सुनते ही मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है, जो छल-प्रपंच की राजनीति से कोसों दूर, सादगी और ईमानदारी की मिसाल कायम करते हैं। उनकी पहचान सत्ता के दिखावे या नेतागिरी के अहंकार से नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े सेवाभाव और गाँव के प्रति समर्पण से बनती है। लखन पटेल उस पुराने स्कूल के जनसेवक हैं, जिनके लिए ‘जननीति’ यानी जनता की नीति, राजनीति से ऊपर है।
एक सरपंच के रूप में उनका कार्यशैली सीधी और स्पष्ट है – दिखावे से दूर, काम के पास। वे न तो भव्य सुरुचि वाले कार्यालय में बैठते हैं, न ही ऊँचे-ऊँचे वादे करते हैं। उनकी नेतृत्व शैली में वह ग्रामीण सादगी और ठोस कार्यों पर विश्वास झलकता है, जो आज के दौर में एक दुर्लभ गुण बन गया है। लखन पटेल का मानना है कि सच्ची राजनीति वह है, जो गाँव की जरूरतों और आमजन के कल्याण के इर्द-गिर्द घूमती है।
उनकी मेहनत और निष्ठा का प्रमाण गाँव की विकास यात्रा में देखा जा सकता है। चाहे सड़कों का निर्माण हो, पानी की व्यवस्था हो, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो – हर काम में उनकी निजी देखरेख और पारदर्शिता साफ झलकती है। वे गाँव के हर परिवार की पुकार सुनते हैं, हर समस्या को अपनी समझते हैं। यही कारण है कि ग्राम डकाच्या के लोग उन्हें सिर्फ सरपंच नहीं, बल्कि एक संरक्षक और विश्वसनीय मार्गदर्शक मानते हैं।
लखन पटेल की महानता इसी में है कि उन्होंने सत्ता के प्रतीकों को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उनके लिए सरपंच का पद अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सेवा का माध्यम है। वे गाँव के लिए ‘जी-जान से लगे रहते हैं’ – यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उनकी दिनचर्या का सच है। सुबह-सवेरे गाँव का चक्कर लगाना, लोगों से रूबरू मिलना, कार्यों की प्रगति स्वयं देखना – यह उनकी जमीनी नेतृत्व शैली का अभिन्न अंग है।
एक ऐसे दौर में जब पंचायती राज संस्थाएं भी अक्सर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और भ्रष्टाचार के दलदल में फँसती दिखती हैं, लखन पटेल एक आशा की किरण हैं। वे साबित करते हैं कि ईमानदारी, सादगी और जनसेवा का मार्ग आज भी प्रासंगिक और सम्मानजनक है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा नेता वह नहीं जो सिंहासन पर चढ़ता है, बल्कि वह है जो जनता के दिलों में अपनी जगह बनाता है।
लखन पटेल ग्राम डकाच्या की नहीं, बल्कि पूरी पंचायती राज व्यवस्था की शान हैं। उनके माध्यम से ‘जननीति’ की वह धारा फिर से सशक्त होती है, जो हमें याद दिलाती है कि शासन का अंतिम लक्ष्य केवल सत्ता नहीं, बल्कि जनकल्याण होना चाहिए।
