सोशल मीडिया पर रातों-रात चमकने वाले चेहरों की दुनिया उतनी ही बेरहम भी है। जो नाम कल तक हर स्क्रीन पर छाया रहता है, वही आज भीड़ के शोर में खो जाता है। ऐसा ही एक नाम है पिंटू—वह लड़का, जिसने “कृष का गाना सुनेगा… दिल ना दिया, दिल ना दिया ले बेटा” गाकर इंटरनेट पर तहलका मचा दिया था। कुछ सेकंड की उस क्लिप ने उसे पहचान दी, लेकिन ज़िंदगी नहीं बदली।
पिंटू का असली ठिकाना जमशेदपुर की सड़कें हैं। पिछले कई सालों से वह कचरा बीनकर गुज़ारा करता है। दिनभर सड़क पर भटकना, कचरा उठाना और नशे की गिरफ्त—यही उसकी दिनचर्या बन चुकी है। विडंबना यह है कि आज उसके पास फोटो खिंचवाने वालों की भीड़ तो लगती है, मगर उसके दर्द को सुनने वाला कोई नहीं।
पिंटू की कहानी बचपन से ही टूटी हुई है। मां की मौत के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली और उसे घर से निकाल दिया। बेसहारा पिंटू नशे की लत में फंसता चला गया। समय के साथ कई गंभीर बीमारियों ने उसे घेर लिया, लेकिन इलाज तक पहुंचने का रास्ता उसके लिए बंद ही रहा।
सोशल मीडिया ने उसे पल भर की शोहरत दी, पर स्थायी सहारा नहीं। वायरल वीडियो के बाद भी उसकी हालत नहीं बदली—न घर मिला, न रोज़गार, न इलाज। यह कहानी उस सच की याद दिलाती है कि ‘वायरल’ होना मदद नहीं, बल्कि अक्सर तमाशा बन जाना होता है।
हालांकि अब एक राहत की खबर है। एक एनजीओ ने पिंटू के इलाज की जिम्मेदारी ली है और उसे नशे से बाहर निकालने की कोशिश शुरू की है। सवाल यह है कि क्या यह मदद देर से तो नहीं आई? और क्या हम सोशल मीडिया की तालियों से आगे बढ़कर इंसान की ज़िंदगी संवारने की जिम्मेदारी निभाएंगे?
