जब साँस लेना भी लग्ज़री बन जाए

दस साल पहले की बात है। हर सुबह सूरज निकलने से पहले मैं अपने जूते बाँधती थी और खुद को कार्टर रोड की तरफ जाते हुए पाती थी। समुद्र की ठंडी हवा मेरे चेहरे से टकराती थी, जैसे कोई चुपचाप हौसला दे रहा हो। वही हवा थी, जिसने मुझे इस शहर से और दौड़ने से प्यार करा दिया।

दौड़ना सिर्फ़ आदत नहीं था वो मेरी दवा थी। वो मेरा सुकून था, वो मेरा सहारा था। आज भी सुबह होती है।
आज भी मैं दौड़ना चाहती हूँ। लेकिन अब जूते बाँधने से पहले मास्क पहनना पड़ता है। मुझे कभी नहीं लगा था कि ऐसा दिन आएगा। पहले डर था कि हवा में वायरस है। आज डर है कि हवा खुद ज़हर बन चुकी है।

अब मेरे घर के दरवाज़े और खिड़कियाँ ज़्यादातर बंद रहते हैं। कमरे में एयर प्यूरीफायर चलता रहता है।
और मेरी दौड़ अब कार्टर रोड पर नहीं, ट्रेडमिल पर होती है। समुद्र की जगह दीवार।
लहरों की आवाज़ की जगह मशीन की घड़घड़ाहट। मैं दौड़ती तो हूँ, लेकिन वो बात नहीं रही।

दौड़ना आज भी मेरे दिमाग को साफ करता है। आज भी मुझे टूटने से बचाता है।
लेकिन अंदर कहीं एक डर बैठ गया है—जिस चीज़ ने मुझे ज़िंदा रखा, कहीं वही मुझे धीरे-धीरे खत्म तो नहीं कर रही? पॉल्यूशन हर साँस के साथ मेरे सालों के अनुशासन, मेरी मेहनत, मेरे सपनों को निगल रहा है। ये अब किसी मौसम की समस्या नहीं रही। ये किसी बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए।

ये जीने का सवाल है। फिर भी हर सुबह, मेरे जैसे कई लोग मास्क लगाकर बाहर निकलते हैं। दौड़ते कम हैं,
ज़्यादा शोक मनाते हैं—उस सुबह का, उस हवा का, उस शहर का जिससे हम कभी प्यार करते थे। और मन में बस एक ही सवाल गूंजता है— क्या बेसिक जवाबदेही माँगना सचमुच बहुत ज़्यादा है?

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