पुणे में कल छात्रों ने ऐसा आंदोलन किया, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। छात्रों ने एक चिता तैयार की और उस पर लिखा—“ये हमारे सपने हैं, जो अब मर चुके हैं।”
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। आज छात्रों ने उस चिता को सच में आग के हवाले कर दिया।
सोचिए, जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, डिग्री और नौकरी के सपने होने चाहिए, उसी उम्र में वे अपने सपनों की चिता जला रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों?
इन छात्रों का कहना है कि पढ़ाई करने के बाद भी नौकरी नहीं है, मेहनत के बाद भी मौके नहीं हैं और भविष्य को लेकर लगातार चिंता बढ़ती जा रही है।
ये सिर्फ एक चिता नहीं थी। ये उन युवाओं की बेचैनी थी, जो पूछ रहे हैं कि आखिर उनके सपनों का क्या होगा?
सरकार से सवाल है—क्या ये तस्वीरें और ये आग दिखाई दे रही है?
क्योंकि जब युवा अपने सपनों के मरने की बात करने लगें, तो इसे सिर्फ एक प्रदर्शन समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आज पुणे की इस चिता से उठता धुआं सिर्फ आसमान में नहीं जा रहा, बल्कि सत्ता से एक सवाल पूछ रहा है—आखिर युवाओं के सपनों को कौन बचाएग

