गाँव से शहर तक – यादों की गठरी

सुबह का धुंधलका था। पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा वह आख़िरी बार अपने गाँव को देख रहा था। मिट्टी की सोंधी खुशबू, कुएँ से खींचे पानी की आवाज़, और माँ के आँगन में बिखरे तुलसी के पत्ते, सब कुछ उसकी आँखों में उतर आया। शहर जाना उसकी मजबूरी थी, पर गाँव छोड़ना उसके दिल का फैसला कभी नहीं था।

ट्रेन की सीटी जैसे ही बजी, बचपन की गलियाँ एक-एक कर सामने आने लगीं। स्कूल जाते वक्त नंगे पाँव भागना, खेतों में पिता के साथ हल पकड़ना, और शाम को दोस्तों के साथ तालाब किनारे बैठकर सपने बुनना, ये सब यादें उसकी गठरी में बँधी थीं। शहर में मेहनत की रोटी मिल जाएगी, यह भरोसा था, पर गाँव जैसी अपनाहट कहाँ मिलेगी, यह सवाल हर कदम पर साथ था।

शहर की इमारतें ऊँची थीं, पर दिल में छत नीची लगती थी। काम के लंबे घंटे, अजनबी चेहरे, और रातों की तन्हाई, इन सबके बीच वह गाँव को याद करता। माँ की चिट्ठी आती तो शब्दों से पहले मिट्टी की खुशबू महसूस होती। पिता की सीख,“मेहनत में इज़्ज़त है”, उसे हर सुबह उठाती।

हर त्योहार पर वह गाँव लौटने का सपना देखता। खेतों में लहलहाती फसल, घर की दीवारों पर पड़ती धूप, और चूल्हे की आँच पर पकती रोटियाँ, यही उसकी असली कमाई थी। शहर ने उसे पैसे दिए, पर पहचान गाँव ने दी।

वह जानता था कि चाहे कितनी भी दूर चला जाए, उसका दिल वहीं रहेगा, उस कच्चे रास्ते पर, जहाँ कदमों के निशान मिट्टी में नहीं, यादों में बसते हैं। गाँव से निकले लोग शहर में कामाते ज़रूर हैं, पर जीते हमेशा अपने गाँव के साथ ही हैं।

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