जंतर-मंतर से आज सवाल सीधा है—आखिर ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए पूरी सत्ता इतनी बेचैन क्यों नजर आ रही है?
विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार सिर्फ एक चेहरा हैं, असली ताकत और फैसला लेने वाले लोग उनके पीछे छिपे हैं। यही वजह है कि जब देश के जनप्रतिनिधि चुनाव प्रक्रिया और वोट को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो उनकी आवाज दबाने की कोशिश क्यों हो रही है?
सवाल सिर्फ एक चुनाव अधिकारी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें जनता का वोट सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। अगर चुनाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब मिलना चाहिए, सवाल पूछने वालों को रोकना नहीं चाहिए।
जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक लोकतंत्र से जुड़े इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक उनका सत्याग्रह जारी रहेगा।
अब सवाल ये है—अगर सरकार को लगता है कि सब कुछ साफ-सुथरा है, तो फिर विपक्ष की आवाज से इतनी बेचैनी क्यों?
आखिर किसे बचाया जा रहा है और क्यों?
जंतर-मंतर से उठ रही ये आवाज अब सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि लोकतंत्र में अपने वोट की ताकत पर भरोसा करने वाले हर नागरिक की आवाज बनती जा रही है।

