गाँव से शहर तक – यादों की गठरी
सुबह का धुंधलका था। पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा वह आख़िरी बार अपने गाँव को देख रहा था। मिट्टी की सोंधी खुशबू, कुएँ से खींचे पानी की आवाज़, और माँ के आँगन में बिखरे तुलसी के पत्ते, सब कुछ उसकी आँखों में उतर आया। शहर जाना उसकी मजबूरी थी, पर गाँव छोड़ना उसके दिल…
