वक़्त जैसे थम-सा गया है

एक्सीडेंट के बाद से रेस्ट पर हूं, एक जगह पड़े रहना सचमुच सज़ा से कम नहीं। वक़्त जैसे थम-सा गया है, कटता ही नहीं। कुछ कर भी नहीं सकता, तो बस इन्हीं फ़िल्मों और सीरियल्स को दोबारा देखने में दिल बहला लिया। कमाल है ये सिनेमा—जितनी बार देखो, उतनी ही बार नया लगता है… मानो…

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एमपी में कफ सिरप पीने से 20 बच्चों की मौत

एमपी में कफ सिरप पीने से 20 बच्चों की मौत के मामले में बड़ा एक्शन हुआ है। तमिलनाडु स्थित श्रीसन फार्मास्युटिकल कंपनी के मालिक एस. रंगनाथन को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उन्हें चेन्नई की अदालत में पेश करने के बाद ट्रांजिट रिमांड पर छिंदवाड़ा लाया जाएगा।

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मध्य प्रदेश में 31 हजार सरकारी स्कूल बंद, क्या अंधेरे में धकेला जा रहा है भविष्य?

पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। सरकारी आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में अब तक करीब 93,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जिनमें से 31,000 स्कूल अकेले मध्य प्रदेश में बंद किए गए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि उस…

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जोशी सर: चार दशक की शिक्षा, सेवा और संस्कारों की मिसाल

ग्राम डकाच्या में पिछले 40 वर्षों से शिक्षा की अलख जगा रहे हेमंत जोशी केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक पूरे गाँव की यादों, संस्कारों और भविष्य का हिस्सा हैं। बच्चे हों या अभिभावक—सब उन्हें स्नेह और सम्मान से “जोशी सर” के नाम से जानते हैं। उनकी पहचान किसी पद या पुरस्कार से नहीं, बल्कि…

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हिट गानों से गुमनामी तक, अनवर की अधूरी कहानी

70 से 90 के दशक के बीच हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसी आवाज़ गूंजी, जो सुनते ही दिल ठहर जाता था। ये आवाज़ थी Anwar Hussain की, एक ऐसा नाम, जो कभी हर दूसरे रेडियो और कैसेट प्लेयर पर सुनाई देता था। अनवर की सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज़ थी। इतनी साफ, इतनी मुलायम…

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शानदार ख़बर: ‘होमबाउंड’ ऑस्कर की शॉर्टलिस्ट में शामिल

Homebound एक फ़िल्म नहीं, एक एहसास है। बहुत संवेदनशील, बहुत भावुक, ख़ासकर उन परिवारों के लिए जिनके बच्चे संघर्ष कर रहे हैं। जब ज़िंदगी में लगे सब खत्म हो रहा है, तब Homebound के किरदार उम्मीद याद दिलाते हैं। देखिए, महसूस कीजिए।

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हिन्दी भाषी प्रदेश झूठ और भ्रम की जकड़ में है

हिन्दी भाषी प्रदेश झूठ और भ्रम की इतनी जकड़ में है कि ताजमहल को हिंदू मंदिर मानने जैसा अजीबोगरीब भ्रम भी सच मान लेगा। 2014 के बाद का भारत तथ्य और वास्तविकता से पूरी तरह कट चुका है। ऐसे माहौल में परेश रावल जैसे सदाबहार और बहुमुखी अभिनेता का अपने करियर को इन प्रचारपूर्ण फ़िल्मों…

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हर उम्र में बदलती हुई एक फ़िल्म

एक फ़िल्म, तीन हिस्से और एक ज़िंदगी बचपन से “मेरा नाम जोकर” फ़िल्म से मेरी क़रीबी रही है. यह क़रीबी किसी एक बार देखने से नहीं बनी, बल्कि धीरे-धीरे, उम्र के साथ गहरी होती चली गई. मेरे पिता ने मेरे जन्मदिन पर मुझे इस फ़िल्म की सीडी लाकर दी थी. उस सीडी में फ़िल्म तीन हिस्सों…

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1992 का वो समय… और रघुनाथ काका की ब्रेड

सुबह की चाय या तो सूखी रोटी के साथ होती थी, या फिर पराठा–पूरी के संग। गाँव में हर चीज़ आसानी से नहीं मिलती थी।और तभी, भोपु के बीच एक आवाज़ गूँजती—“ब्रेड ले लो…” बस, इतना सुनते ही दिल धड़क उठता।नंगे पाँव दौड़ पड़ते थे हम सब… रघुनाथ काका की ब्रेड लेने। रघुनाथ काका…हर मौसम…

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डिजिटल दुनिया में उलझे गांव, असल रिश्ते हो रहे कमजोर

आज गांवों की गलियों में जो बदलाव सबसे तेज़ी से दिख रहा है, उसकी वजह मोबाइल फोन है। कभी गांवों की पहचान आपसी मेल-जोल, भरोसे और रिश्तों की मज़बूती से होती थी, आज वही रिश्ते शक, तुलना और दिखावे की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। मोबाइल की यह “विजय” गांवों के युवाओं से लेकर शादीशुदा…

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