संसद का मानसून सत्र 2026 खत्म हो चुका है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी छोड़ गया है। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पूरे सत्र के दौरान लोकसभा की कार्यवाही से लगभग दूर रहे और आखिरी दिन सदन में पहुंचे। सवाल उठ रहा है कि क्या संसद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पूरे सत्र में सदन की कार्यवाही में नजर नहीं आए?
तथ्य यह है कि मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला। सरकार के मुताबिक इस सत्र में 19 बैठकें प्रस्तावित थीं।
सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद परिसर में जरूर पहुंचे थे और उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए उम्मीद जताई थी कि मानसून सत्र सार्थक और उत्पादक रहेगा।
लेकिन इसके बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री और खासकर गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। विपक्ष का आरोप था कि छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई जैसे गंभीर मुद्दों पर गृह मंत्री को संसद में आकर जवाब देना चाहिए था।
सबसे ज्यादा चर्चा अमित शाह की गैरमौजूदगी को लेकर हुई। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी सवाल उठाया और आरोप लगाया कि गृह मंत्री सत्र के आखिरी दिन ही सदन में पहुंचे।
दिलचस्प बात यह रही कि 13 अगस्त को सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों लोकसभा में पहुंचे। लेकिन सदन की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद स्थगित हो गई। रिपोर्टों के मुताबिक अमित शाह पहली बार उस सत्र में लोकसभा पहुंचे थे और सदन करीब चार मिनट बाद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।
अब सवाल है कि क्या इसे संसद के इतिहास की पहली ऐसी घटना कहा जा सकता है?
फिलहाल ऐसा दावा करना सही नहीं होगा। संसद के लंबे इतिहास में प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों की सदन में मौजूदगी अलग-अलग सत्रों में अलग रही है। किसी मंत्री का हर दिन सदन में मौजूद रहना संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। इसलिए यह कहना कि ऐसा पहली बार हुआ है, ठोस ऐतिहासिक रिकॉर्ड के बिना सही नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक सवाल फिर भी महत्वपूर्ण है।
गृह मंत्री देश की आंतरिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और कई संवेदनशील मामलों से जुड़े सवालों के लिए संसद में सरकार का प्रमुख चेहरा होते हैं। अगर विपक्ष किसी मुद्दे पर सीधे गृह मंत्री से जवाब मांग रहा है तो उनकी सदन में मौजूदगी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार की तरफ से भी यह तर्क दिया गया कि विपक्ष यह तय नहीं कर सकता कि कौन सा मंत्री कब सदन में आएगा। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अमित शाह की गैरमौजूदगी के आरोपों पर कहा था कि गृह मंत्री संसद भवन आते हैं और देर तक काम करते हैं।
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। मानसून सत्र खुद भारी हंगामे और गतिरोध का शिकार रहा। रिपोर्टों के अनुसार लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा की करीब 39 प्रतिशत रही।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सदन में कितने दिन दिखाई दिए।
बड़ा सवाल यह है कि संसद में जनता के सवालों पर कितनी गंभीर और सार्थक बहस हुई?
लोकतंत्र में सरकार को जवाब देना है और विपक्ष को सवाल पूछने हैं। दोनों पक्ष अगर सदन में आमने-सामने बैठकर बहस करेंगे तभी संसद मजबूत होगी।
इसलिए इस घटना को इतिहास में ‘पहली बार’ बताने से ज्यादा जरूरी है कि देश यह पूछे कि क्या हमारी संसद में सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की जगह कम होती जा रही है?
क्योंकि संसद सिर्फ कानून बनाने की जगह नहीं है। यह जनता के सवालों का सबसे बड़ा मंच है। और इस मंच पर सरकार की मौजूदगी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है विपक्ष की आवाज भी।

