70 से 90 के दशक के बीच हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसी आवाज़ गूंजी, जो सुनते ही दिल ठहर जाता था। ये आवाज़ थी Anwar Hussain की, एक ऐसा नाम, जो कभी हर दूसरे रेडियो और कैसेट प्लेयर पर सुनाई देता था।
अनवर की सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज़ थी। इतनी साफ, इतनी मुलायम और इतनी मिलती-जुलती कि कई बार लोग धोखा खा जाते थे। कहा जाता है कि जब खुद Mohammed Rafi ने उनकी आवाज़ सुनी, तो चौंक पड़े और मज़ाक में बोले, “ये गाना मैंने कब गाया?” ये बात मज़ाक जरूर थी, लेकिन इसके पीछे एक सच्चाई छिपी थी, अनवर की आवाज़ में वही जादू, वही मिठास थी, जो रफ़ी साहब की पहचान थी।
धीरे-धीरे अनवर का करियर ऊंचाई पकड़ने लगा। एक के बाद एक हिट गाने, “तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम”, “हमसे का भूल हुई”, इन गीतों ने उन्हें हर घर का जाना-पहचाना नाम बना दिया। वो दौर ऐसा था जब उनकी आवाज़ दर्द भी बयां करती थी और मोहब्बत भी। लेकिन हर ऊंचाई के साथ एक खतरा भी आता है, और वो है आत्मविश्वास का धीरे-धीरे अहंकार में बदल जाना।
कहानी यहीं से मोड़ लेती है।
अपने करियर के पीक पर, जब अनवर के पास काम की कोई कमी नहीं थी, तब उन्होंने एक गाने के लिए तय रकम से करीब एक हज़ार रुपये ज़्यादा मांग लिए। आज के हिसाब से ये रकम छोटी लग सकती है, लेकिन उस दौर में यह बात कई म्यूजिक डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स को खटक गई। बॉलीवुड सिर्फ टैलेंट पर नहीं चलता, यहां रिश्ते, छवि और व्यवहार भी उतने ही मायने रखते हैं।
कुछ लोगों ने इसे ‘ज़्यादा मांग’ नहीं, बल्कि ‘रवैया’ समझ लिया। नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे अनवर को मिलने वाले ऑफर्स कम होने लगे। जिन दरवाज़ों पर कभी उन्हें बुलाया जाता था, वही दरवाज़े अब बंद होने लगे। और फिर, वही हुआ जो अक्सर इस इंडस्ट्री में होता है, एक नई आवाज़ आई, नया ट्रेंड आया, और पुरानी आवाज़ें भीड़ में खोने लगीं।
देखते ही देखते अनवर का करियर ढलान पर आ गया। वो आवाज़, जो कभी हर दिल पर राज करती थी, धीरे-धीरे खामोश होती चली गई। बॉलीवुड में काम मिलना उनके लिए मुश्किल होता गया, और एक समय ऐसा आया जब वो लगभग गायब ही हो गए।
अनवर की कहानी हमें एक कड़वी लेकिन सच्ची सीख देती है, यहां सिर्फ हुनर काफी नहीं होता, वक्त, किस्मत और व्यवहार, तीनों का साथ होना जरूरी है।
कभी-कभी ऊंचाई पर पहुंचकर हमें लगता है कि हम सुरक्षित हैं…
लेकिन एक छोटा सा फैसला, एक छोटी सी चूक, और सब कुछ बदल जाता है।
