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गाँव की झिझक से मुंबई की बेबाकी तक…

सरकारी स्कूल से पढ़ा हूँ। 9वीं कक्षा से लड़कियाँ भी साथ पढ़ने लगी थीं (Co-ed)। वैसे लड़कियाँ कम ही थीं, गाँव का माहौल सख्त था, न वो बात करतीं, न हम। शुरुआत की पाँच लाइनों में लड़के, आख़िरी की दो लाइनों में लड़कियाँ बैठा करती थीं, वो भी लड़कों से दस हाथ दूर। न बात, न शेयरिंग।

थोड़ा आगे बढ़े, हाई सेकेंडरी पहुँचे। वहाँ भी माहौल लगभग पहले जैसा ही था, मगर कभी-कभार बातचीत हो जाया करती थी। कुल मिलाकर सामाजिक ताना-बाना ही कुछ ऐसा बना दिया गया था, परवरिश ही कुछ इस तरह से की गई थी। गाँव, स्कूल, खेल का मैदान या कभी-कभी हाट-बाज़ार में लड़कियाँ मिल जाया करती थीं, मगर मजाल है कोई वास्ता हो; न उनका लड़कों से, न लड़कों का उनसे। और सोचिए, यह वही समय होता है जब आप जवानी की पहली सीढ़ी चढ़ चुके होते हैं। वैसे भी गाँव में लड़के-लड़कियाँ शहरों के बनिस्बत जल्दी जवान हो जाया करते हैं।

बहरहाल, कॉलेज पहुँचा। पढ़ाई पूरी भी नहीं हुई और मैं जॉब में चला आया। दैनिक भास्कर में नौकरी लग गई। यह वह दौर था जब भास्कर, या यूँ कहूँ अख़बारों के मालिक लाला लोग, कॉर्पोरेट की तरफ बढ़ चले थे। 2005 में भास्कर ने ज़ी ग्रुप के साथ मिलकर जॉइंट वेंचर ‘DNA’ अंग्रेज़ी अख़बार मुंबई से शुरू किया। मुझे भी ऑफर मिला, मैंने लपक लिया। इंदौर भास्कर से रात 12 बजे अख़बार का काम निपटाकर, तब टेम्पो ट्रैक्स (टैक्सी) चलती थीं, इंदौर से खंडवा पहुँचा, जहाँ यूपी से मुंबई जाने वाली महानगरी एक्सप्रेस में सुबह 5 बजे बिना रिज़र्वेशन के चालू टिकट लेकर घुस गया।

मुंबई पहुँचा तो देखा, लड़कियों का पहनावा, मेकअप, स्टाइल एकदम फ़िल्मी था। ऐसा कभी लाइव देखा नहीं था। हर दूसरी लड़की ऐसी लग रही थी, मानो कोई मॉडल या एक्ट्रेस हो। कईयों को तो तब तक देखता रहता, जब तक वो नज़र से ओझल न हो जाएँ। खैर, DNA पहुँचा, जॉइन किया। वहाँ भी बड़ा ग्लैमरस माहौल था। कम कपड़ों में, क्लेवेज़ शो करती लड़कियाँ, हर एक घंटे बाद सिगरेट पीतीं, बात-बात पर WTF बोलतीं, अजीब-अजीब से कपड़े पहनतीं। मैं, ‘बॉल’ को ‘बाल’ और ‘प्रॉब्लम’ को ‘प्राबलम’ बोलने वाला ठेठ हिंदी भाषी। काम अंग्रेज़ी में था, क्योंकि अख़बार अंग्रेज़ी का था। मेरे जैसे कई लोग और भी थे, जो अलग-अलग प्रदेशों से आए हुए थे।

मेरी तैनाती नेशनल ख़बरों वाले डेस्क पर हुई, जिसमें दो-तीन आदमी और आठ-दस लड़कियाँ थीं। एक दफा एक संपादक और दो लड़कियाँ मुझे घेरे काम करवा रहे थे। तभी स्क्रीन पर उँगली से बताते हुए एक लड़की का स्तन(बूब )मेरे सीधे हाथ से टच हो गया। मैं असहज हो गया, खून नसों में सरपट दौड़ने लगा, अजीब-से बुलबुले शरीर में उठने लगे। तभी ब्रेक लेकर सुट्टा एरिया में चला गया। पाँच मिनट बाद देखा, वही लड़की उँगलियों में सिगरेट दबाए मेरी तरफ चली आ रही थी। उसने सिगरेट ऑफर की, मैंने मना कर दिया। थोड़ी देर बाद हम फिर काम करने लगे।

DNA में हाईली एजुकेटेड, ग्लैमरस इंडिपेंडेंट लड़कियाँ काम करती थीं। सभी बहुत ह्यूमन थीं, बहुत रिस्पेक्ट करती थीं। कोई भेदभाव नहीं, शायद उनकी परवरिश लड़कों के साथ हुई होगी। बातचीत, शेयरिंग और एक खुले माहौल में सब बड़े हुए होंगे, जहाँ लड़के-लड़कियाँ काफी कम्फर्टेबल होते हैं।

सारा खेल आपके आस-पास बने माहौल और सोसाइटी का है। बचपन से ही साथ रहते तो लड़कियों को एक टैबू की तरह न लेते, तो शायद चीज़ें अलग होतीं। लगभग 20 साल लगे मुझे महिलाओं के साथ सहज होने में। पूरे यक़ीन के साथ कह सकता हूँ, किसी भी प्रोफेशन में जब आप अपने कलीग के साथ सहज हो जाते हैं, तो काम और कम्युनिकेशन दोनों आसान हो जाते हैं।

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