देश में महंगाई का सवाल अब सिर्फ अर्थशास्त्र की किताबों तक सीमित नहीं है। यह सीधे आम आदमी की रसोई और जेब से जुड़ा सवाल बन चुका है। महीने की शुरुआत में बना बजट महीने के आखिर तक बिगड़ जाता है। घर का राशन हो, सब्जियां हों, दूध हो या बच्चों की पढ़ाई और आने-जाने का खर्च, हर तरफ बढ़ती कीमतों का असर दिखाई देता है।
महंगाई की सबसे बड़ी मार उन परिवारों पर पड़ती है, जिनकी आमदनी तेजी से नहीं बढ़ती। वेतन वही रहता है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जाते हैं। ऐसे में परिवारों को अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है। कभी बाहर खाना बंद होता है, कभी खरीदारी टलती है और कई बार बच्चों की जरूरतों को भी अगले महीने के लिए छोड़ना पड़ता है।
रसोई का हिसाब देखें तो सब्जियों और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में थोड़ी सी बढ़ोतरी भी परिवार के मासिक बजट पर असर डालती है। अगर आलू, प्याज, टमाटर, दाल, तेल और दूध जैसी जरूरी चीजें महंगी होती हैं तो इसका असर सिर्फ एक सामान पर नहीं, पूरे घर के खर्च पर पड़ता है।
दूसरी तरफ पेट्रोल और डीजल की कीमतों का असर सीधे और परोक्ष दोनों तरह से पड़ता है। वाहन चलाने वाले व्यक्ति का खर्च बढ़ता है, वहीं सामान ढोने की लागत बढ़ने से परिवहन का असर बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यानी पेट्रोल पंप पर बढ़ा खर्च धीरे-धीरे घर की रसोई तक पहुंच जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार महंगाई को कैसे नियंत्रित करती है। सरकार के पास टैक्स, आयात-निर्यात नीति, भंडारण व्यवस्था और बाजार में आपूर्ति बनाए रखने जैसे कई साधन हैं। जब किसी जरूरी वस्तु की कीमत अचानक बढ़ती है तो सरकार को सिर्फ बयान देने के बजाय बाजार में वास्तविक राहत पहुंचाने की कोशिश करनी होती है।
हालांकि महंगाई की पूरी जिम्मेदारी किसी एक सरकार या एक विभाग पर डालना भी सही नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार, कच्चे तेल की कीमत, मौसम, फसल, आपूर्ति, मांग और वैश्विक परिस्थितियां भी कीमतों को प्रभावित करती हैं। लेकिन आम आदमी के लिए कारण से ज्यादा जरूरी राहत होती है।
यही वजह है कि महंगाई चुनावी मुद्दा भी बनती है। विपक्ष सरकार पर हमला करता है और कहता है कि जनता की आमदनी और खर्च के बीच अंतर बढ़ रहा है। सरकार अपनी नीतियों और आंकड़ों के जरिए स्थिति नियंत्रित होने का दावा करती है। लेकिन बाजार में खरीदारी करने वाला आम आदमी अपने अनुभव से महंगाई को मापता है।
आज जरूरत ऐसी आर्थिक नीतियों की है, जिनका फायदा सिर्फ आंकड़ों में नहीं बल्कि आम परिवार के बजट में दिखाई दे। रोजगार बढ़े, आमदनी बढ़े और जरूरी वस्तुओं की कीमतें नियंत्रण में रहें, तभी आर्थिक विकास का फायदा आम जनता तक पहुंचेगा।
आम आदमी को बहुत बड़ी मांग नहीं है। वह चाहता है कि महीने की कमाई से महीने का घर आराम से चल जाए। बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन, इलाज और आने-जाने का खर्च पूरा करने के बाद भी थोड़ी बचत हो सके।
महंगाई का असली आंकड़ा किसी रिपोर्ट में नहीं, उस परिवार की रसोई में दिखाई देता है जो हर महीने खर्च जोड़ते समय सोचता है कि इस बार कटौती कहां करें।
यही सवाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। जनता को आंकड़ों से ज्यादा अपनी जेब में राहत चाहिए।

