अर्बन नक्सल के बाद ‘दिमागी नक्सल’ पर बवाल क्यों मचा है?

भारतीय राजनीति में शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते। कई बार एक शब्द पूरी राजनीतिक बहस का चेहरा बदल देता है। इन दिनों ऐसा ही एक शब्द चर्चा में है, ‘दिमागी नक्सल’। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से अपने भाषण में इस शब्द का इस्तेमाल किया। इसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है।

प्रधानमंत्री का तर्क था कि जंगलों में हथियार उठाने वाले नक्सलवाद के खिलाफ देश ने बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन वैचारिक स्तर पर मौजूद चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने ऐसी मानसिकता से सावधान रहने की बात कही, जो युवाओं को प्रभावित कर समाज में असंतोष और हिंसा का माहौल पैदा कर सकती है।

यहीं से विवाद शुरू हुआ।

विपक्ष का सवाल है कि ‘दिमागी नक्सल’ आखिर है कौन? इसकी कोई स्पष्ट और आधिकारिक परिभाषा क्या है? अगर कोई सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, किसी आंदोलन का समर्थन करता है या किसी विचारधारा से असहमति रखता है, तो क्या उसे नक्सल कहना सही होगा?

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। CPI(M) नेता एमए बेबी ने भी आरोप लगाया कि पहले सरकार के आलोचकों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाता था और अब ‘दिमागी नक्सल’ का नया टैग इस्तेमाल किया जा रहा है।

असल विवाद यहीं है। असहमति और नक्सलवाद में फर्क क्या है?

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना नागरिक का अधिकार है। वहीं हिंसा, हथियारबंद विद्रोह और लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसा के जरिए चुनौती देना बिल्कुल अलग बात है। इसलिए सरकार अगर वैचारिक हिंसा या युवाओं के ब्रेनवॉश की बात कर रही है तो उसे यह भी साफ करना चाहिए कि वह किन लोगों और किस तरह की गतिविधियों की बात कर रही है।

‘अर्बन नक्सल’ शब्द को लेकर भी पहले ऐसी ही बहस हो चुकी है। अब ‘दिमागी नक्सल’ के इस्तेमाल ने उसी बहस को एक नए नाम और नए संदर्भ के साथ वापस ला दिया है। राजनीतिक विरोधियों का आरोप है कि ऐसे शब्द बहस को मुद्दों से हटाकर लोगों की पहचान पर ले जाते हैं। दूसरी तरफ सरकार और उसके समर्थकों का मानना है कि नक्सली विचारधारा सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं होती और उसके वैचारिक प्रभाव को भी चुनौती देना जरूरी है।

लेकिन आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि नया राजनीतिक शब्द कौन सा है। सवाल यह है कि क्या सरकार और विपक्ष जनता के असली मुद्दों पर भी उतनी ही गंभीरता से बात करेंगे?

बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, किसानों की समस्या और युवाओं का भविष्य जैसे सवाल देश के सामने हैं। अगर राजनीतिक बहस लगातार एक-दूसरे को नए-नए नाम देने में उलझती रही तो असली मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।

‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर मचा विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक बयान की बहस नहीं है। यह इस बड़े सवाल से जुड़ गया है कि लोकतंत्र में विरोध की सीमा क्या है और असहमति को देशविरोध समझने की शुरुआत कहां से होती है?

सरकार को अपनी चिंता स्पष्ट करनी चाहिए और विपक्ष को भी यह बताना चाहिए कि वह हिंसा या चरमपंथ के खिलाफ कहां खड़ा है।

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला दुश्मन नहीं होता। लेकिन हिंसा का समर्थन करने वाले को सिर्फ इसलिए सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह सत्ता का विरोध कर रहा है।

बहस ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर नहीं, बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि लोकतंत्र में विचारों की लड़ाई किस सीमा तक जायज है और उस सीमा के बाद क्या होता है।

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