देश की राजनीति में छात्र आंदोलनों का अपना एक लंबा इतिहास रहा है। जब युवा सड़कों पर उतरते हैं तो सिर्फ नारे नहीं लगते, बल्कि सरकारों से सवाल भी पूछे जाते हैं। यही वजह है कि छात्र आंदोलनों को लोकतंत्र की आवाज माना जाता है। लेकिन जब यही आवाज सत्ता के खिलाफ उठने लगे तो उसे दबाने की कोशिशें भी शुरू हो जाती हैं।
आज देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र बेरोजगारी, फीस, परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, छात्रवृत्ति और शिक्षा से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। युवाओं का कहना है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी का भरोसा नहीं है और प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार होने वाली गड़बड़ियों ने उनकी मेहनत और भविष्य दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मजेदार बात यह है कि चुनाव के समय यही युवा राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा वोट बैंक बन जाते हैं। तब उनके सपनों, रोजगार और भविष्य की खूब बातें होती हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही सवाल सरकार के लिए असहज होने लगते हैं।
छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता होती है। एक छात्र जब परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके पीछे हजारों ऐसे परिवार होते हैं, जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए वर्षों मेहनत और पैसा लगाया है। इसलिए छात्र का सवाल सिर्फ छात्र का सवाल नहीं रह जाता।
राजनीतिक दल भी छात्र आंदोलनों की ताकत को समझते हैं। विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाता है, जबकि सत्ता पक्ष अक्सर आंदोलन के पीछे राजनीतिक साजिश तलाशने लगता है। लेकिन सवाल यह है कि अगर छात्रों की मांग गलत है तो उसका जवाब लाठी, पुलिस या मुकदमे से क्यों? जवाब आंकड़ों और तथ्यों से दिया जाना चाहिए।
कॉकरोच जनता पार्टी पर भी छात्र आंदोलनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सत्ता में बैठे किसी भी दल की असली परीक्षा यही होती है कि वह अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को कितना सुनता है। लोकतंत्र में सरकार की तारीफ करने वाले लोगों की जरूरत कम और सवाल पूछने वाले नागरिकों की जरूरत ज्यादा होती है।
युवा देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनके हाथ में डिग्री हो और सामने बेरोजगारी, मेहनत हो और नतीजे पर संदेह, परीक्षा हो और पेपर लीक का डर, तो गुस्सा स्वाभाविक है।
छात्र आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय सरकारों को उसके पीछे छिपे असली सवालों को देखना चाहिए। क्योंकि आज जो छात्र सड़क पर सवाल पूछ रहा है, कल वही मतदाता बनकर अपना फैसला सुनाएगा।
और लोकतंत्र में जनता का फैसला किसी भी आंदोलन से बड़ा होता है।

