भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का नाम पिछले एक दशक से किसी ब्रांड की तरह इस्तेमाल होता रहा है। चुनावी राजनीति हो, सरकारी योजनाओं का प्रचार हो या देश की बड़ी राजनीतिक बहस, मोदी की मौजूदगी हर जगह दिखाई देती है। यही वजह है कि अब जब विपक्ष मजबूत होने की कोशिश कर रहा है और कई मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछे जा रहे हैं, तो चर्चा शुरू हो गई है कि क्या मोदी जी का तिलिस्म ढह रहा है?
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है।
एक तरफ 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई और अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई। हालांकि NDA के सहयोग से नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। यह नतीजा जरूर बताता है कि 2014 और 2019 जैसी एकतरफा राजनीतिक स्थिति कायम नहीं रही।
लेकिन दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। 2026 में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य में बड़ी सफलता हासिल की। इससे साफ है कि मोदी और बीजेपी की चुनावी मशीनरी को कमजोर मान लेना जल्दबाजी होगी।
लोकप्रियता के आंकड़े भी मोदी के लिए अभी चुनौती की पूरी कहानी नहीं बताते। 2026 में Morning Consult से जुड़े सर्वे में मोदी को 68 प्रतिशत अप्रूवल के साथ दुनिया के सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक नेताओं में शीर्ष पर बताया गया। यानी यह कहना कि मोदी की लोकप्रियता अचानक खत्म हो गई है, आंकड़ों के आधार पर सही नहीं होगा।
फिर सवाल आखिर उठ क्यों रहा है?
दरअसल, राजनीति में सिर्फ लोकप्रियता ही सब कुछ नहीं होती। जनता का मूड, स्थानीय मुद्दे, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, किसान और युवाओं की नाराजगी जैसे सवाल चुनाव के समय बड़ा असर डाल सकते हैं। हाल के छात्र आंदोलनों ने भी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय बहस में ला दिया है।
मोदी की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और मजबूत राजनीतिक ब्रांड रहा है। लेकिन किसी भी लंबे राजनीतिक दौर में एक समय ऐसा आता है जब जनता नेता से ज्यादा अपने रोजमर्रा के सवालों पर ध्यान देने लगती है। यही वह जगह है जहां सरकार की असली परीक्षा होती है।
इसलिए शायद सवाल यह नहीं है कि मोदी का तिलिस्म पूरी तरह ढह रहा है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या उस तिलिस्म की चमक पहले जैसी बनी हुई है?
फिलहाल जवाब मिला-जुला है। बीजेपी अभी भी मजबूत है, मोदी की लोकप्रियता भी कायम है, लेकिन विपक्ष के पास पहले से ज्यादा मौके दिखाई दे रहे हैं। 2029 तक की राजनीति में बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और सामाजिक मुद्दे कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं, यह तय करेगा कि मोदी का राजनीतिक प्रभाव और मजबूत होता है या उसमें धीरे-धीरे दरारें दिखाई देने लगती हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में कोई भी तिलिस्म हमेशा के लिए नहीं होता। आखिरकार फैसला जनता करती है।

