पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने वाली E20 नीति अब सिर्फ ईंधन का मामला नहीं रह गई है। यह धीरे-धीरे राजनीतिक मुद्दा भी बनती जा रही है। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल लगातार इस नीति का विरोध कर रहे हैं और अब केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के इस्तीफे की मांग भी उठ रही है।
केजरीवाल का सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर पुराने वाहनों के मालिकों को E20 पेट्रोल क्यों इस्तेमाल करना पड़े, जबकि उनकी गाड़ियों को कम एथेनॉल वाले ईंधन के हिसाब से तैयार किया गया था। विरोध करने वाले लोगों का दावा है कि E20 से कुछ वाहनों में माइलेज कम हुआ है, इंजन और मेंटेनेंस को लेकर परेशानी बढ़ी है और वाहन मालिकों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ सकता है।
यही वजह है कि केजरीवाल इस मुद्दे को आम आदमी की जेब से जोड़ रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर पेट्रोल महंगा है और उसके साथ माइलेज भी कम हो रहा है तो इसका सीधा असर बाइक, कार, टैक्सी और ट्रांसपोर्ट चलाने वाले करोड़ों लोगों पर पड़ेगा।
केजरीवाल ने E20 के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर अभियान भी शुरू किया। उन्होंने लोगों से जुड़ने के लिए नेशनल टाउनहॉल किया और दो लाख से ज्यादा हस्ताक्षरों वाली याचिका प्रधानमंत्री को सौंपने का अभियान चलाया। अगस्त में उन्होंने गोवा में यहां तक कहा कि अगर 2027 में उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो पांच दिन के भीतर राज्य में E20 पेट्रोल की बिक्री पर रोक लगा दी जाएगी।
लेकिन सरकार का पक्ष भी अलग है। केंद्र का कहना है कि एथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, प्रदूषण घटाना और किसानों के लिए गन्ने तथा दूसरे फीडस्टॉक की मांग बढ़ाना है। सरकार ने यह भी कहा है कि E20 को लेकर फैलाई जा रही कई बातें भ्रामक हैं और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी इस संबंध में स्पष्टीकरण दिए हैं।
फिर गडकरी ही निशाने पर क्यों हैं?
दरअसल, नितिन गडकरी लंबे समय से एथेनॉल और वैकल्पिक ईंधन के बड़े समर्थक रहे हैं। इसी वजह से विरोधियों के लिए उनका नाम इस नीति से जोड़ना आसान हो गया है। प्रदर्शनकारियों ने गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी दोनों के इस्तीफे की मांग उठाई है। गडकरी ने दूसरी तरफ E20 कार्यक्रम से उन्हें और उनके परिवार को कथित आर्थिक लाभ से जोड़ने वाली पोस्ट और डीपफेक सामग्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाया है।
यानी मामला अब दो हिस्सों में बंट गया है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और प्रदूषण कम करने की नीति बता रही है, जबकि विरोधी इसे उपभोक्ताओं की परेशानी और ईंधन की पसंद से जोड़ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनता को E20, E10 या दूसरे विकल्पों में से अपनी गाड़ी के हिसाब से ईंधन चुनने की आजादी मिलनी चाहिए?
अगर सरकार इस सवाल का संतोषजनक जवाब देती है तो विवाद शांत हो सकता है। लेकिन अगर माइलेज, पुराने वाहनों और उपभोक्ता की पसंद को लेकर शिकायतें बढ़ती रहीं तो E20 आने वाले दिनों में सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन सकता है।
फिलहाल केजरीवाल ने इस मुद्दे को पकड़ लिया है। अब देखना यह है कि यह आंदोलन सिर्फ राजनीतिक अभियान बनकर रह जाता है या पेट्रोल पंप तक पहुंची जनता की नाराजगी सचमुच एक बड़ा आंदोलन खड़ा करती है।

