दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल का मामला अब सिर्फ पुलिस कार्रवाई का सवाल नहीं रह गया है। यह सीधे जवाबदेही का सवाल बन चुका है। अगर प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चली, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इसे चलाने का आदेश किसने दिया और किन परिस्थितियों में इसकी जरूरत पड़ी?
इस मामले में तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया था, लेकिन घायल प्रदर्शनकारियों के मेडिकल रिकॉर्ड और सामने आई रिपोर्टों ने इस दावे पर सवाल खड़े किए। कुछ रिपोर्टों में CRPF सूत्रों के हवाले से RAF के एक जवान द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल की बात कही गई। रिपोर्ट के मुताबिक सात राउंड फायर किए गए और कई प्रदर्शनकारी घायल हुए।
सबसे गंभीर सवाल घायल छात्रों को लेकर है। 19 वर्षीय साहिल लोचब की आंख में चोट लगी और उसके इलाज के दौरान धातु के छर्रे निकाले जाने की बात सामने आई। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया। राहुल गांधी 21 अगस्त को साहिल के साथ संसद मार्ग थाने पहुंचे और FIR दर्ज करने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए। बाद में पुलिस ने शिकायत पर FIR दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की।
अब असली सवाल यह है कि अगर पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ तो क्या यह किसी अधिकारी के आदेश पर हुआ या मौके पर मौजूद जवान ने अपने स्तर पर फैसला लिया?
भीड़ नियंत्रण के लिए सुरक्षा बलों के पास अलग-अलग विकल्प होते हैं। स्थिति के हिसाब से बातचीत, बैरिकेडिंग, वाटर कैनन, आंसू गैस और दूसरे गैर-घातक उपाय अपनाए जा सकते हैं। पैलेट गन का इस्तेमाल इसलिए ज्यादा गंभीर माना जाता है क्योंकि इससे आंखों और शरीर के दूसरे हिस्सों में गंभीर चोट लग सकती है।
यही वजह है कि इस मामले में सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि कानून-व्यवस्था संभालने के लिए बल प्रयोग किया गया। जनता यह जानना चाहती है कि बल प्रयोग की सीमा किसने तय की और पैलेट गन तक पहुंचने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
मामला अब राजनीतिक भी हो चुका है। विपक्ष सरकार और पुलिस पर सवाल उठा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। गृह मामलों की संसदीय समिति में भी इस मुद्दे को उठाने की कोशिश हुई और इस पर सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई।
लेकिन राजनीति से अलग एक सीधा सवाल है। अगर कोई छात्र प्रदर्शन कर रहा है और उसे ऐसी चोट लगती है जिससे उसकी आंख तक प्रभावित हो जाती है, तो उसकी शिकायत दर्ज होना और निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।
इसलिए अब मांग सिर्फ FIR की नहीं होनी चाहिए। जांच में यह भी सामने आना चाहिए कि उस दिन मौके पर कौन-कौन से बल तैनात थे, किस अधिकारी की कमान थी, पैलेट गन किसके पास थी, हथियार इस्तेमाल करने का आदेश किसने दिया और क्या तय नियमों के तहत इसका इस्तेमाल हुआ।
जंतर-मंतर लोकतांत्रिक विरोध की जगह है। वहां प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था, दोनों जरूरी हैं।
अगर पैलेट गन का इस्तेमाल नियमों के मुताबिक हुआ था तो सरकार को पूरी जानकारी सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए। और अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैलेट गन किसने चलाई?
बड़ा सवाल यह है कि उसे चलाने की नौबत क्यों आई और उसकी जवाबदेही किसकी है?

